Sunday, September 17, 2017

प्यारी सी है सिमरन...


 अगर बात सिर्फ बंधनों को तोड़ने की है तो यह बात जरूरी है लेकिन बात जब बंधनों को पहचानने की हो तो और भी ज़रूरी हो जाती है. सही गलत सबका अपना होता है ठीक वैसे ही जीवन जीने का तरीका भी सबका अपना होता है. भूख प्यास भी सबकी अपनी होती है, अलग होती है. हमारा समाज अभी इस अलग सी भूख प्यास को पहचानने की ओर बढ़ा नहीं है. सिमरन उसी ओर बढती हुई एक अच्छी फिल्म है.

जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है. 

शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती  है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना  बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में. 

वो अपने पिता से कहती है, 'हाँ मैं गलतियां करती हूँ, बहुत सी गलतियां करती हूँ लेकिन उन्हें मानती भी हूँ न'. वो जिंदगी का पीछा करते-करते कुछ गलत रास्तों पर निकल जाती है मुश्किलों में फंसती चली जाती है लेकिन हार नहीं मानती। उसकी संवेदनाएं उसका साथ नहीं छोड़ती। बैंक लूट के वक़्त जब एक सज्जन को दौरा पड़ता है तो उन्हें पानी पिलाती है.' बैंक लूट की घटना के बाद किस तरह ऐसे अपराधों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार मान लिए जाने की आदत है लोगों में इस पर अच्छा व्यंग्य है साथ ही एक मध्यमवर्गीय भारतीय पिता की सारी चिंता किसी भी तरह बेटी की शादी पर ही टिकी होती हैं इसको भी अंडरलाइन करती है फिल्म।

सिमरन एक साफ़ दिल लड़की है. छोटे छोटे सपने देखती है, घर का सपना, जिंदगी जीने का सपना, शादी उसका सपना नहीं है, वो प्यार के नाम पर बिसूरती नहीं रहती लेकिन किसी के साथ कोई धोखा भी नहीं देती। गलतियों को जस्टिफाई नहीं करती, उनसे बाहर निकलने का प्रयास करती है. प्रफुल्ल के किरदार को कंगना ने बहुत प्यार और ईमानदारी से निभाया है. फिल्म शादी, ब्वॉयफ्रेंड, दिल टूटने या जुड़ने के किस्सों से अलग है. तर्क मत लगाइये, सही गलत के चक्कर में मत पड़िये बस कंगना से प्यार हो जाने दीजिये।

पिछले दिनों अपने बेबाक इंटरव्यू को लेकर कंगना काफी विवाद में रही है. विवाद जो उसकी साफगोई से उपजे। कौन सही कौन गलत से परे एक खुद मुख़्तार लड़की कंगना ने अपना मुकाम खुद बनाया है.... उसकी हंसी का हाथ थाम लेने को जी करता है, सब कुछ भूलकर जिन्दगी को जी लेने को दिल करता है.  


Friday, September 1, 2017

ताप, बारिश, इश्क शहर


देह पर से ताप यूँ गुजर रहा है
जिस तरह तुम्हारी याद गुजरती है
उनींदी आँखों की कोरों से
टप्प से टपक जाने से ठीक पहले

कानों में बारिशें किसी राग सी घुल रही हैं
मध्धम मध्धम
हरारत भरी आँखों में शरारत घुल रही है
बारिश के आगे फैलाई हथेलियों पर
गिरती हैं हल्की गर्म सी बूँदें
जैसा बारिश ने लिया हो हथेलियों का बोसा

बारिश में भीगे रास्ता भटककर मुंडेर पर आ बैठे पंक्षी
कनखियों से देखते हैं बारिश को भी मुझे भी
कि उनको अपने स्पर्श की गर्माहट देना चाहती हूँ
वो भी शायद करीब आने को आकुल हैं

देह पर से ताप यूँ ही नहीं गुजर रहा है
गुजर रहा है बहुत कुछ संग संग...

Tuesday, August 29, 2017

उठो न शहर गोरखपुर


सुनो गोरखपुर,

कब तक उठाते रहोगे अपने कन्धों पर
मासूमों की लाशें
कब तक अव्यवस्थाओं को
अपना चेहरा बना रहने दोगे

कब तक 'गोरख्पुरिये' शब्द को
अजीब तरह से इस्तेमाल होते देखते रहोगे
और कब तक कुछ भी हो जाने पर भी
चैन से करवट लेकर सोते रहोगे
कब तक मासूमों की मौतों को
आंकड़ों में तब्दील होते देखते रहोगे

बोलो शहर,
क्या तुम्हारे सीने में कोई दर्द की लहर नहीं उठती
कोई ज्वालामुखी नहीं फूटता
क्या सचमुच तुम्हारा जी नहीं करता कि
मासूमों की सांसों को तोड़ देने वाली सरकारों की
धज्जियाँ उड़ा दी जाएँ

बोलो शहर
अगस्त को बच्चों की मौत का महीना कहकर
पल्ला झाड़ने वालों से तुम्हें कोई शिकायत नहीं

सुनो फ़िराक गोरखपुरी के शहर के वाशिंदों
जरा अपनी आत्मा में अकुलाहट भरो
जरा निवाला तोड़ने से पहले
उन मासूमों के चेहरे याद करो जो
बरसों से वक़्त से पहले विदा होते जा रहे हैं
जरा चैन से अपने घरों में चादर ओढकर सोने से पहले
उन माओं की आँखों को याद कर लो
जो बरसों से सोयी नहीं हैं

उठो न शहर गोरखपुर
कि तुम्हारी चुप्पी अब असहनीय है....


(यह कोई कविता न समझी जाय. यह कुछ न कर पाने की कुंठा है और जो हो रहा है उसके प्रति गुस्सा है )

Sunday, August 20, 2017

चलो न जी लेते हैं....


घर की दहलीज़ लांघना आसान नहीं होता, जाने कितनी पुकारें रोकती हैं, जाने कितने दर्द, कितनी जिम्मेदारियां. कैसा कच्चा पक्का सा होता है मन. लेकिन शो मस्ट गो ऑन की तर्ज़ पर निकलना ज़रूरी होता है और निकलने का उपाय निकलना ही होता है सो चल पड़े थे सफर को फिर एक बार...छतीसगढ़, रायपुर.

ऐसा हड़बड़ी का दिन था कि दवाइयां रखना तो याद रहा लेकिन बहुत कुछ छूट भी गया, एयरपोर्ट जाकर याद आया कि मोबाइल भी छूटा है...एक ही मिनट की बेचैनी थी बस....उसके बाद से असीम शांति है...पहली बार इतने दिन बिना मोबाईल के हूँ.

सुबह बिटिया को स्कूल छोड़ने जाते वक़्त एक्सीडेंट होते-होते बचने से शुरू हुआ वो दिन मोबाईल घर पर छूटने भर पर नहीं रुका. रायपुर पहुँच कर पता चला कि मेरा सामान भी जाता रहा. एक जैसे ट्रैवेल बैग थे तो एयरपोर्ट पर बेल्ट से कोई और सज्जन मेरा बैग अपना समझ के ले गए. (हालाँकि तमाम लिखत पढ़त और पड़ताल के बाद सामान अगले दिन वापस मिल गया)

दोस्तों के होते जिन्दगी में कभी कुछ कमी रही ही नहीं, देवयानी का सामान उसके कपडे सब उससे पहले मेरे हो गए एक पल भी न लगा.

सुबह की हथेलियों में सारी परेशानियों का ईनाम था.आँख खुली और खुद को किसी गहरे हरे समंदर के बीचोबीच पाया.....इतना हरा, इतना हरा...उफ्फ्फ.

धमतरी में हमारा ऑफिस किसी ख़्वाब सा मालूम होता है, ऑफिस होते हुए भी ऑफिस लगता नहीं. कोना-कोना जिस लाड़ से जिस स्नेह से सजाया गया है, जिस तरह हर कोना अपने पास रोक लेता है वह एहसास कमाल है. नवनीत बेदार और उनकी टीम ने इसे काम की तरह नहीं इश्क की तरह अंजाम दिया है...दे रहे हैं...हम उनके इश्क को महसूस कर रहे हैं.

देवयानी लम्हों को सहेजना जानती है, मेरे पागलपन के सुर में सुर लगाना जानती है. धान के खेतों में हवा से बनती लहर को देखना किसी जादू को देखने सा मालूम होता है..घंटों ताकते रहने को जी चाहता है, बहुत सारा चुप रहने को जी चाहता है, बोलने से हवा की लय न टूट जाए कहीं...हम उसे छेड़ना नहीं चाहते...बस जीना चाहते हैं...अभी इस हरे समंदर में डुबकियां ले रही हूँ...आवाज कोई नहीं है आसपास...एक ख़ामोशी तारी है...भीतर कुछ खाली हो रहा है, कुछ भर रहा है...

छुटपुट बतकहियाँ भी हैं, किस्से हैं, जेएनयू के किस्से ऐसे कि आँखें भीग जाएँ...और प्यार हो जाए जेएनयू से, उन सब दोस्तों से जो हैं आसपास और जो हैं जिक्र में...

जिन्दगी कितनी खूबसूरत तो है...चलो न इसे जी लेते हैं....इन खूबसूरत लम्हों में तनिक मर ही लेते हैं....

(धमतरी डायरी, 19 अगस्त 2017 )

झूम रहे हैं धान हरे हैं- जन्मदिन मुबारक कवि त्रिलोचन

हरा भरा संसार है आँखों के आगे
ताल भरे हैं, खेत भरे हैं
नई नई बालें लहराए
झूम रहे हैं धान हरे हैं
झरती है झीनी मंजरियाँ
खेल रही है खेल लहरियाँ
जीवन का विस्तार है आँखों के आगे

उड़ती उड़ती आ जाती है
देस देस की रंग रंग की
चिड़ियाँ सुख से छा जाती हैं
नए नए स्वर सुन पड़ते हैं
नए भाव मन में जड़ते हैं
अनदेखा उपहार है आँखों के आगे

गाता अलबेला चरवाहा
चौपायों को साल सँभाले
पार कर रहा है वह बाहा
गए साल तो ब्याह हुआ है
अभी अभी बस जुआ छुआ है
घर घरनी परिवार है आँखों के आगे
(रचना-काल - 28-10-48)