Tuesday, November 14, 2017

जब टूटता है दिल


टूटना
पहाड़ तब नहीं टूटता
जब पहाड़ टूटता है
पहाड़ तब टूटता है
जब टूटता है दिल.

भरना
दिल भर आने से नहीं भर आतीं
सूखी नदियाँ
पोखर
कुएं
बावडी
इनके सूखेपन से
भर आता है दिल.

Saturday, November 11, 2017

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ



जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
पल भर को थम जाती है धरती की परिक्रमा
बुलबुल का जोड़ा मुड़कर देखता है
टुकुर टुकर

लीची के पेड़ के पत्तों पर से टपकती बूँदें
थम जाती हैं कुछ देर को
जैसे थम जाती हैं मुलाकात के वक़्त
प्रेमियों की साँसे

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
नदियों की कलकल में एक वेग आ जाता है
जंगलों के जुगनुओं की आँखें चमक उठती हैं
सड़क के मुहाने पर फल बेचने वाली बूढी काकी
सहेजती हैं फलों की नमी

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
बढ़ जाती हैं बच्चों की शरारतें
गिलहरियों की उछलकूद
ज्यादा गाढे हो जाते हैं फूलों के रंग
और मीठी लगने लगती है बिना चीनी वाली चाय

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ
चरवाहे के गीत गूंजने लगते हैं फिजाओं में
शहर की टूटी सड़कें भी गुनगुना उठती हैं
प्यार में टूटे दिलों की धडकनों को
मिलता है कुछ पलों को आराम

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ
होंठों से नहीं निकलता कोई भी शब्द
फिर भी सुनती है
पूरी कायनात...

करीब करीब सिंगल होती है दिलों से मिंगल



संवादों के इस शोर में, लोगों की इस भीड़ में कोई अकेलापन चुपके से छुपकर दिल में बैठा रहता है, अक्सर बेचैन करता है. जीवन में कोई कमी न होते हुए भी ‘कुछ कम’ सा लगता है. अपना ख्याल खुद ठीक से रख लेने के बावजूद कभी अपना ही ख्याल खुद रखने से जी ऊब भी जाता है. वीडियो चैटिंग, वाट्सअप मैसेज, इंटरनेट, दोस्त सब मिलकर भी इस ‘कुछ कम’ को पूर नहीं पाते. करीब करीब सिंगल उस ‘कुछ’ की तलाश में निकले दो अधेड़ युवाओं की कहानी है. जया और योगी यानी इरफ़ान और पार्वती.

योगी के बारे में फिल्म ज्यादा कुछ कहती नहीं हालाँकि योगी फिल्म में काफी कुछ कहते हैं. लेकिन जया के बहाने समाज के चरित्र की परतें खुलती हैं. दोस्त उनके अकेले होने का बिंदास फायदा उठाते हैं और पीछे उनका मजाक भी उड़ाते हैं. कभी उसे कोई बच्चों के साथ शौपिग के लिए भेजती है, कभी कोई बेबी सिटिंग के लिए पुकार लेती है. मित्र भाव से जया यह सब करती भी है लेकिन साथ ही अकेले होने को लेकर एक तानाकशी का रवैया भी महसूस करती रहती है. एक अकेली स्त्री किस तरह समाज के लिए स्टपनी की तरह समझी जाती है. जिसे हर कोई अपना काम निकालने के लिए कहीं भी इस्तेमाल करना चाहता है. और खूँटी समझकर उस पर अपनी सलाह टांगने के लिए. जिस दिन वो खूँटी होने से मना कर देती है स्टपनी होने से इंकार कर देती है उस दिन उस दिन इस समाज की शक्ल देखने लायक होती है.

फिल्म की नायिका जिन्दगी में जिन्दगी तलाश रही है लेकिन उदासी को ओढ़े नहीं फिर रही है. शिकायत का रंग उसकी जिन्दगी के रंग में घुला हुआ हो ऐसा भी नहीं है. वो विधवा है लेकिन वैधव्य की नियति में घिसट नही रही. उसने भीतर जिन्दगी सहेजी हुई है, जिन्दगी जीने की लालसा को खाद पानी दिया है लेकिन इस जीने की जिजीविषा में ‘कुछ भी’ ‘कैसा भी’ की हड़बड़ी नहीं है. एक एलिगेंस, एक ठहराव वो जीती है और इसी की तलाश में है.

एक रोज वो एक डेटिंग वेबसाईट पर लॉगिन करती है. एकदम से वीयर्ड कमेंट्स नमूदार होते हैं, जया हडबडा जाती है. लेकिन अगले रोज एक मैसेज मिलता है उसे जो उसे अलग सा लगता है. यहीं से शुरू होती है फिल्म. किसी कॉफ़ी शॉप का बिजनेस बढ़ाने के बहाने शुरू हुई मुलाकातें ट्रैवेल एजेंसी का बिजनेस बढ़ाने लगती हैं. डेटिंग वेबसाईट कितनी भरोसेमंद होती हैं पता नहीं लेकिन फिल्म उनके प्रति उदार है. योगी की तीन पुरानी प्रेमिकाओं से मिलने के बहाने दोनों निकल पड़ते हैं पहले ऋषिकेश, फिर अलवर और उसके बाद गंगटोक.

फिल्म एक साथ दो यात्राओं पर ले जाती है. रोजमर्रा की आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर प्राकृतिक वादियों में नदियों की ठंडक, हवाओं की छुअन महसूस करते हुए भीतर तक एक असीम शान्ति से भरती जाती है जिसमें योगी का चुलबुला अंदाज़ अलग ही रंग भरता है. प्रेम का पता नहीं लेकिन दोनों साथ में अलग-अलग यात्राओं को जीने में कोई कसर नहीं छोड़ते खासकर जया.

फिल्म की कहानी और इस कहानी का कहन दोनों ही अलहदा है. वो जो अकेले होना है, फिल्म में उसका बिसूरना कहीं नहीं है, उसकी गहनता है. जो संवाद हैं वो अपने भीतर ढेर सारे अनकहे को सहेज रहे होते हैं. और वो जो ख़ामोशी है वो बहुत गहरे उतरती है. शब्दहीनता में कोई जादू गढ़ती. फिल्म दिल्ली, देहरादून, ऋषिकेश, अलवर, गंगटोक घुमाते हुए ले जाती है अपने ही भीतर कहीं. यह एक खूबसूरत प्रेम कहानी है जो असल में प्रेम की यात्रा है. बेहद अनछुए लम्हों को सहेजते हुए, अनकहे को उकेरते हुए.

किसी ताजा हवा के झोंके सी मालूम होती है यह फिल्म. सारे मौसम, सहरा, पहाड़, जंगल, फुहार सब महसूस होते हैं. योगी की शायरी के बीच सुनी जा सकती है वो खामोश कविता जिसे इंटरनेट पर पब्लिसिटी की दरकार नहीं है.

यह फिल्म असल में ख्वाबों पर यकीन करने की फिल्म है, जिन्दगी में आस्था बनाये रखने की फिल्म है. एक संवेदनशील और मौजूं विषय को सलीके से उठाया भी गया है और निभाया भी गया है जिसमें हास्य की मीठी फुहारें झरती रहती हैं. बस योगी के किरदार को थोड़ा बंद सा रखा गया है, मसलन एक स्त्री के अकेलेपन पर समाज के रवैये को तो दिखाया गया है लेकिन एक पुरुष किरदार के जरिये दूसरे पक्ष को भी सामने लाने का मौका जैसा गँवा दिया गया हो. या फिर योगी करते क्या हैं, 'मेरे पास बहुत पैसा है 'और पुरानी गर्लफ्रेंड द्वारा 'फटीचर'कहे जाने के बीच वो कहीं अटके हुए हैं जिसका भेद खुलता नहीं है.

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद प्रभावी हैं. तारों भरे आसमान के नीचे नींद की गोद में लुढ़क जाना हो या नींद की गोलियों के असर में जया की पजेसिवनेस का उभरना या बात करते करते योगी का सो जाना. फिल्म का क्लाइमेक्स बिना किसी हड़बड़ी के अपने मुकाम तक पहुँचता है...एक रिदम में. वो रिदम फिल्म के अंतिम दृश्य के अनकहे संवाद तक बनी रहती है.

फिल्म की खूबसूरती को सिनेमेटोग्राफी ने खूब निखारा है. कुछ फ्रेम तो जेहन में ठहर से जाते हैं. फिल्म की एडिटिंग चुस्त है, एक भी दृश्य या संवाद बेवजह नहीं लगता. इरफ़ान हमेशा की तरह लाजवाब हैं जया के किरदार में पार्वती भी खूब खिली हैं. बिना किसी ‘आई लव यू’ के यह साफ सुथरी सी प्रेम कहानी दिल को छू लेती है. संगीत फिल्म को कॉम्प्लीमेंट करता है. खासकर वो जो था ख्वाब सा क्या कहें या जाने दें’ गाना जो सुनने में मधुर, मौजूं और प्रभावी पिक्चरजाइशेन बांधता है. फिल्म के संवाद काफी चुटीले और असरदार हैं.

Friday, November 10, 2017

उम्र चौदह की होने को है...


ख़्वाहिश के भीतर खुद को देखती हूँ, उसकी उम्र को जीती हूँ. उसके स्कूल के दिन, दोस्तों की बातें, टिफिन की चोरियां, धौल धप्पे, अबे तबे, मस्तियाँ, शरारतें सब. वो स्कूल जाते समय साइकल के पैडल पर पैर मारती है तो महसूस करती हूँ पंख उगते हुए. स्कूल से लौटते ही किस मूड में दरवाजा खोलेगी इसका इंतजार करती हूँ. दरवाज़ा जिस मूड में खुलता है उसमें स्कूल में दिन कैसा बीता की पूरी दास्ताँ छुपी होती है...'क्या मम्मा इट वाज़ सो बोरिंग टुडे...' 'ओ वाव आज तो मजा ही आ गया...' 'कितना एक्साइटिंग दिन था. ' 'आज तो बस पनिशमेंट मिलते मिलते रह ही गयी...' 'पता है आज कैसे जुगाड़ करके अपनी दोस्त को मैम से डांट खाने से बचाया...' 'आयूष तो कल पिटेगा पक्का, बोलो टिफिन ऐसे गायब किया जैसे कभी था ही नहीं'...'

'मम्मा आज क्या हुआ पता है, सिमरन मैम आई थीं स्कूल, सिमरन मैम. हम लोग क्लास से भागकर पहुँच गए उनसे मिलने, पता है बाकी टीचर्स को सिमरन मैम से ईर्ष्या होती होगी, पूरे स्कूल के बच्चे उनके फैन हैं. वो टीचर्स की शाहरुख़ खान हैं' कहते कहते उसकी आवाज नम होने लगती है. सिमरन मैम पिछले साल क्लास टीचर थीं, मैं भी उनकी फैन हो गयी थी. सारे बच्चों के लिए किस तरह प्रोटेक्टिव थीं, पैरेंट्स से भी उनके बच्चों के लिए लड़ जाती थीं...और जिस दिन सिमरन मैम ने स्कूल छोड़ा उस दिन बल्कि कई हफ़्तों तक घर के कोनों में सिसकियाँ सुनाई देती थीं.

कार्निवाल की तैयारी, स्पोर्ट्स डे की तैयारी, पीटीएम का डर सब जीती हूँ. एक रोज मैंने उसे पूछा, तुम्हें तो डांट पड़ती नहीं तो तुम क्यों डरती हो पीटीएम से तो हंसकर बोली, 'हाँ मैं भी ऐसा सोचती हूँ कि मैं क्यों डरती हूँ फिर सोचा जब सब डरते हैं तो थोड़ा मैं भी डर ही लेती हूँ हा हा हा...' बताओ भला क्या लॉजिक है...इस उम्र में लॉजिक कहाँ चलते हैं. यह उम्र ख़्वाबों के आकार लेने की उम्र है. उसे छूती हूँ तो मानो आसमान छू लिया हो.

अभी वो मुझसे किसी बात पर नाराज है...मैं उसकी पसंद का पास्ता बना रही हूँ वो मुस्कुरा रही है. बुरी तरह से लूडो में हराने को वो फिर से तैयार है...गोटियाँ लगाई जा रही हैं...घर में चौदह बरस की दो लड़कियां रहती हैं इन दिनों...

(किशोरी बेटी की माँ की डायरी )

Thursday, November 9, 2017

फांस


तुम्हारी याद किसी फांस सी धंस गयी थी
टीसती रहती थी लगातार
टप टप टप...टपकता रहता था कोई दर्द

निकालने की कोशिश में
उसे और भीतर धंसा देती थी
दर्द की लहक बढ़ जाती थी

यह दर्द आदत बन चुका था
इस दर्द से मुक्ति की लगातार कोशिश
असल में फांस को भीतर धकेलने की कोशिश
दर्द को जिन्दा रखने की कोशिश थी
खुद को भी

एक रोज फांस को निकालने के बहाने जब
स्मृतियों की महीन सुई से उसके संग खेल रही थी
वो फांस निकल ही गयी एकदम से

धीरे-धीरे खत्म हो गया दर्द
जीवन भी...