Tuesday, February 20, 2018

वो दिन मुझसे खेल रहा है...



सीढियां उतरती हूँ तो जी चाहता है सीढियां ख़त्म ही न हों कभी. रास्तों पर निकलती हूँ तो चलती ही जाती हूँ लगातार, बिना थके, बिना रुके. खूब बात करती हूँ लोगों से लेकिन जीती हूँ ख़ामोशी ही. 'हाँ, सब ठीक है' दूसरों को बताते हुए किसी मन्त्र की तरह दोहराती हूँ. चाहती हूँ कोई आसपास न हो, कोई भी नहीं. हालाँकि जानती हूँ कोई है भी नहीं. कभी होगा भी नहीं. जो साथ थे  वो भी भरम ही थे होने का कि असल में वो तब भी कभी नहीं थे जब वो थे...इसलिए अब जो साथ है वो इस बात को समझ पाना भर है.

एक लम्बे समय से खुद को किसी कारागार में पा रही हूँ. हर उदास करने वाली चीज़ अच्छी लग रही है. ये उदासी का मौसम है. भीतर भी, बाहर भी. जिन पंक्षियों को उड़ते देख खुश होती थी अब खुश नहीं होती. अपनी उदासी को पहचानती हूँ. उसे हाथ में लेकर गोल-गोल घुमाती हूँ, उसे मेज पर अख़बार के ठीक बगल में. रख देती हूँ, उदासी उसके प्रति मेरी इस बेजारी से परिचित नहीं है इसलिए चौंक रही है.

यह अलग सा अनुभव है कि उदासी है लेकिन उदास नहीं हूँ, ठीक वैसे ही जैसे जीवन है लेकिन जीवन में नहीं हूँ

मोह कोई नहीं है सिवाय एक कप चाय पीने की इच्छा के कि आखिर एक दिन सब छूट ही जाना है.
टटोलती हूँ तो वो छूट जाने वाला दिन बहुत आसपास लगता है...

वो दिन मुझसे खेल रहा है...

Sunday, February 18, 2018

उनका सम्मान उनका हक है


एक मेज बड़ी सी. उस मेज के उस पार जमीन पर दरी बिछाकर बैठे बच्चे. उनकी आँखों में ‘कुछ मिलेगा’ की उम्मीद. मेज के इस पार कुछ गर्वीले लोग. मेज पर प्लास्टिक के फूलों वाला गुलदान. जमा किये गए कुछ गाँव के लोग भी. गर्वीले लोग एक-एक कर भाषण देते हैं, जिसे सुनते हुए बच्चे ऊब रहे हैं. उनकी नजर उन बंद डिब्बों में है जिनमें उनको दान में दिए जाने वाला सामान बंद है. शिक्षिकाएं बच्चों की लाइन लगवाकर दान लेने के लिए तैयार करती हैं. दान में पेन्सिल, और कॉपियों का सेट है, एक पैकेट बिस्कुट का है और एक पैकेट जूस. देने वाले ने अपनी पोजीशन फोटो के हिसाब से ठीक सेट की. दूसरे साथी ने अच्छी तस्वीरों के लिए कैमरा मुस्तैद कर लिया है. ‘लडकियों को आगे करो, लड़कियों को आगे करो’ का स्वर गूंजता है. ‘बेटी पढ़ाओ’ के नारे की भरपाई तस्वीर में नज़र आये इसका ख्याल रखा गया. बच्चे बिस्कुट के पैकेट खोलते हैं, बड़े चाय नमकीन खाते हुए अपनी दानवीरता पर मुग्ध हैं. शिक्षिकाएं खुश हैं कि उनके स्कूल के बच्चों को ‘कुछ तो मिला’. ये सरकारी स्कूल के बच्चे हैं. 
अपने काम के सिलसिले में मुझे अक्सर सरकारी स्कूलों में जाने का अवसर मिलता है. इस दौरान इस तरह के दान के माहौल वाले दृश्य कई बार नज़रों से गुजरे हैं. स्कूलों से लौटते समय आमतौर पर हमेशा कोई न कोई एक सवाल साथ लौटता है जो महीनों सोने नहीं देता. (कभी-कभी कुछ सुकून देनी वाली संतुष्टियाँ भी लौटती हैं.) दान की इस प्रक्रिया में लगे स्कूल के दो घंटे का समय और बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों में एक अलग तरह की कृतज्ञता की भावना भी लम्बे समय से ऐसी ही बेचैनी का सबब है.

पहला सवाल तो यही कि दान शब्द की अवधारणा क्या है, कहाँ से आती है, इसके निहितार्थ क्या हैं. दूसरे दान करने वाले व्यक्ति का उद्देश्य क्या होता है, क्या इससे उसके भीतर किसी तरह का अपराध बोध कम होता है या दानवीर होने का अहंकार पुष्ट होता है. तीसरे दान लेने वाले व्यक्ति को हम किस तरह देखते हैं.

दान देने वाला सुपीरियर और लेने वाला इन्फीरियर ही क्यों होता है हमेशा. हालाँकि जातीय समीकरणों के मद्देनजर मामला एकदम उलटा नजर आएगा जहाँ भरे पेट ब्राह्मण को भी भूखे पेट किसान व अन्य लोग दान देते हैं. लेकिन यहाँ बात सरकारी स्कूलों के संदर्भ में ही केन्द्रित करना ठीक है.

सरकारी स्कूलों के बच्चों को इस तरह दान केन्द्रित बनाने के अर्थ क्या हैं आखिर? और यह किस कीमत पर हो रहा है? दान की प्रक्रिया क्या है? क्यों है? फिल्म हिंदी मीडियम का वह दृश्य याद आता है जहाँ नायिका और नायक को जब यह एहसास हो जाता है कि उन्होंने किसी गरीब की जगह पर अपने बच्चे का एडमिशन कराके उसका हक छीना है तो इस अपराधबोध से बचने के लिए वो (नायिका) बड़े नामी स्कूल से अपने बच्चे को निकालकर उस गरीब बच्चे को उसका हक लौटा देने की बजाय उस सरकारी स्कूल की मदद करने जा पहुँचते हैं जहाँ वो बच्चा पढ़ रहा है जिसका हक उनके बच्चे ने मारा है. फर्नीचर और किताबों की मदद, स्कूल को बेहतर बनाने की मदद, रंगाई पुताई सब. इसके साथ ही अपराध बोध खत्म.

हम ऐसे ही समाज बनते जा रहे हैं. अपने बेहतर होने के गर्व से उन्नत हमारा माथा और अकड़ी हुई गर्दन हमारे अहंकार का ही प्रतिरूप है. फिर यह कैसा बेहतर होना है. सरकारी स्कूल के बच्चों के सम्मान के बारे में आखिर किस तरह सोचता है यह समाज? वो ज़रूरतमंद हैं यह सोचकर अपनी अहम पुष्टि के तमाम दरवाजे लोगों को वहां खुलते नज़र आते हैं. राजनैतिक, धार्मिक, सामजिक बैनर के तहत यहाँ दान दिए जाते हैं. कभी-कभार लोग अपने बच्चों का जन्मदिन मनाने भी यहाँ आ पहुंचते हैं. जन्मदिन वाला बच्चा बाकी बच्चों को गिफ्ट देता है, बाकी बच्चे लाइन लगाकर गिफ्ट लेते हुए उसकी लम्बी उम्र की दुआ करते हैं. दान लेते हुए बच्चों की तस्वीरें खींची जाती हैं, सोशल मीडिया पर अपनी पीठ ठोंकी जाती है. जबकि दूसरी ओर एक पूरी पीढ़ी हाथ बढ़ाने और कृतज्ञ होने की आदी होते हुए, दान दाता के जयघोष में अपनी आवाज ऊंची करते हुए बड़ी होती है.

समानता, समता के संवैधानिक मूल्यों में क्या अवसरों की समानता के साथ सबके लिए बराबर सम्मान की बात भी निहित नहीं है? जब भी मैं इन सवालों से जूझ रही होती हूँ तो कुछ लोग कहते हैं कि ‘इसका क्या मतलब है कि किसी की मदद ही न की जाए?’ मैं कहती हूँ मदद कहाँ है यह, यह तो आत्मप्रचार है, आत्म संतुष्टि है और सामने वाले के सम्मान के साथ खिलवाड़ भी है. सुना था कि असल दान वो होता है जिसमें दाहिने हाथ से दिया जाय और बाएं हाथ को खबर न लगे. देने के साथ ही देने वाला भी भूल जाय.

जब तक किसी भी समाज में एक हाथ फैला रहेगा और दूसरा हाथ देने वाला बना रहेगा तब तक समता और समानता एक सपना ही बना रहेगा. अगर इसकी जड़ें स्कूल स्तर पर ही पनपने लगें तो चिंता और भी बढ़ जाती है. अगर शिक्षक अपने स्कूलों को मिलने वाली मदद के बदले अपने बच्चों की प्रदर्शनी लगाने से बचने को तत्पर हों, बच्चों को जो भी चीज़ें मिलें उन्हें इस तरह मिलें कि वो उनका ही हक हैं किसी के द्वारा दी गयी खैरात नहीं, जिसमें उनका सम्मान पूरी तरह बचा रहे तो शायद एक छोटी सी शुरुआत हो सकती है. इस शुरुआत में मिड डे मील परोसती भोजनमाता का स्नेहिल व्यवहार, स्कूल से मिलने वाली ड्रेस और किताबें देते समय शिक्षक का व्यवहार सब कुछ शामिल है. इस सबके लिए हमें पहले खुद यह समझना होगा कि सरकारी सकूलों के बच्चों का सम्मान बचाना है, उन्हें अपने सम्मान और हक के बारे में बताया जाना भी जरूरी है. बाकी हिंदी, गणित, विज्ञान तो बाद की बातें हैं जो लम्बे समय से हो ही रही हैं. लेकिन ऐसा हो सके इसके लिए बच्चों के सम्मान की जरूरत को महसूस करना जरूरी है.

(सुबह सवेरे में प्रकाशित )

Tuesday, January 30, 2018

पुकार लेना बारिश


कई बार चाहा अपना नाम बदल लूं, नदी रख लूं अपना नाम. कभी जी करता कोई बारिश कहकर पुकारे तो एक बार. बहुत दिल चाहता कोई गुलमोहर कहता कभी. कभी मौसम कहकर पुकारे जाने का दिल चाहता कभी गौरेया, कभी तितली, कभी धान, कभी सरसों कभी रहट.  मैं अपने बहुत सारे नाम रखना चाहती थी, लेकिन मेरा एक नाम रखा जा चुका था लिहाजा उसी नाम की परवरिश करने लगी, धीरे-धीरे उसी नाम को प्यार भी करने लगी.

एक वक्त ऐसा भी आया जब मुझे मेरे नाम में ही बारिश, सूरज, नदी, गौरेया, गुलमोहर सब सुनाई देने लगा. कोई पुकारता प्रतिभा तो लगता किसी ने बारिश कहकर दी हो आवाज...और मैं रुक जाती, अगर प्रतिभा की पुकार में मुझे बारिश, मौसम, गुलमोहर या नदी न सुनाई देता तो मैं आगे बढ़ जाती। अरे हजारों प्रतिभा हैं, मैं ही क्यों रुकूं?

भाषा की दुकानों में मेरे नाम का अर्थ जो भी रहा हो मेरे लिए मेरे नाम का अर्थ अब भी वही है जो कुदरत के रंग हैं। 

मैं जो अपने बारे में बताना चाहती थी, उसे सुनने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं थी। लोग वही सुनना चाहते हैं जो वो सुनना चाहते हैं। इसलिए बचपन से हमें वही बोलने की प्रैक्टिस करवाई जाती है, जो लोग सुनना चाहते हैं। बहुत सारी जिंदगी जी चुकने के बाद हमें समझ में आता वो जो हम रहे हैं अब तक वो तो कोई और था, जो मुझमें जीकर चला गया।

मेरे भीतर कोई और जीकर न चला जाए इसकी पूरी कोशिश करती हूँ तुम भी देना मेरा साथ इस कोशिश में इसलिए जब पुकारना मेरा नाम तो पुकार लेना बारिश...

Saturday, January 20, 2018

मुन्नार की पुकार और जीने की तलब


जीवन से जैसे-जैसे नमी की कमी होती जाती है सपने में नदियों, झरनों, समन्दर, बारिश की आवाजाही बढ़ जाती है. पिछ्ला पूरा बरस सपने में बारिशों का बरस रहा. आँख खुलती तो एक लम्हे की फुर्सत का मुंह ताकते भागती फिरती. आंखें मूंदती तो कोई नदी पुकार लेती. यह नदी, जंगल, झरने या समन्दर और रास्तों की पुकार न होती तो जीवन कितना उदास बीतता. छोटे बच्चे जिस तरह माँ के आंचल को हथेलियों में दबाकर सोते हैं उसी तरह इन पुकारों को मुठ्ठियों में भींचकर सो जाती. इस सोने में सुख था. यह पुकार असल में यात्राओं की पुकार थी. जिन्दगी के सबसे मुश्किल दिनों में यात्राओं ने हाथ थामा था. पीठ सहलाई थी. रास्तों ने प्यार किया था, मौसमों ने कलेजे से लगाया था. भीतर की तमाम जद्दोजहद, उतार चढ़ाव, उलझनों को यात्राओं में पिघलते देखा है, महसूस किया है. यात्राओं ने सारी अकराहटों, टकराहटों को धो सोखकर, धो पोंछकर, ताजा और ऊर्जावान बनाकर वापस भेजा फिर से जिन्दगी से जूझने को. मेरा तजुर्बा कहें या ढब कि जिन्दगी से जूझे बगैर जिन्दगी हाथ नहीं आती और इसके लिए बहुत ताकत चाहिए. यह बात कि यह ताकत यात्राओं से मिलती है सबसे पहले बताई थी मेरी प्यारी दोस्त निधि सक्सेना ने. उसका यात्रा संस्मरण पढ़ते हुए हूक उठी थी बस निकल पड़ने की. बस इस हूक का उठाना ज़रूरी था. इसके बाद इस हूक को सहेजना.

यह अजीब बात है कि मेरी यात्राओं से दोस्ती तब हुई जब जिन्दगी से कट्टी हुई. लेकिन धीरे-धीरे यह बदला भी कि जिन्दगी से कट्टी हुए बगैर भी यात्राओं से दोस्ती बनी रही. 

हरा और पानी मेरी कमजोरी है. एक तिनका हरा देखकर जो जो बावली हो जाती हो अगर उसे हरे का समन्दर मिल जाए तो उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. हैवलॉक, कश्मीर, लन्दन, स्कॉटलैंड सब मुझे मंत्रमुग्ध करता रहा. उत्तराखंड के हरे ने, यहाँ की बारिशों ने तो हाथ थामकर रोक ही लिया है. 

कई सालों से मुन्नार का हरा आकर्षित करता रहा है. मुन्नार एक पुकार बनकर भीतर बसा हुआ है बरसों से. किन्ही बेहद दर्दमंद दिनों में, उदासी के लिहाफ दुबके हुए मुन्नार की टिकट करा ली. जिन्दगी ने हंसकर कहा, जाने नहीं दूँगी, कि हजार मुश्किलें जाने से ठीक पहले. लेकिन उस ख्वाब की पुकार और सामने रखी टिकट हौसला बनाये रहे. मैंने जिन्दगी से कहा, 'लड़ मत, तुझसे वहीँ मिलूंगी, मुन्नार के हरे समन्दर, झरनों के बीच, 
आज यात्रा का आरम्भ है हालाँकि मैं जानती हूँ कि अपने भीतर तो मैं बरसों से इस यात्रा में हूँ. पिछली यात्रा लंदन की थी कोई डेढ़ बरस पहले. उसके बाद अब निकलना है. ऐसा नहीं कि इस बीच कहीं जाना नहीं हुआ. बल्कि पिछला बरस तो भागते ही बीता, बैंगलोर, हैदराबाद, रायपुर, भोपाल ,जयपुर दिल्ली लखनऊ की तो बात ही नहीं. लेकिन कहीं जाना यात्रा में होना नहीं होता शायद, यात्रा पर निकलने से पहले, सामान पैक करते हुए खुद को अनपैक करना ज़रूरी होता है. तमाम मसायलों को ब्रेक देना. जेहन को खाली करना ज़रूरी है. 

कल रात तक जाने से पहले की जिन्दगी को समेटने का दबाव था. आज कुछ भी नहीं...सामने रखी टिकट मुस्कुरा रही है उसके पार मुस्कुरा रहा है एक खूबसूरत हरा समन्दर...खुद से किया वादा निभाने जा रही हूँ कि जियूंगी जी भर के इस बरस...

पहाड़ तू तो मेरा दगढ़िया ठैरा


- चन्द्रकला भंडारी

हाँला पहाड़,तू कैसे सोच सकता है कि तेरी याद नहीं आती. तूने ही तो दी थी मुझे कठोर जीवन की आपाधापियों के लाधने की शिक्षा. मैं कैसे बिसर सकती हूँ असौज(सितम्बर और अक्टूबर का महीना जिसमें पहाड़ में खूब काम होता है एक तरफ घास काटना,खेतों में अगली फसल की तैयारी करना,जाड़ों के लिए कच्ची और सुखी लकड़ियों का इंतजाम करना इन महीनों में तो पहाड़ की औरत शायद ही कभी दिन का भात खाती होगी) के महीने में नमकीन पसीना पोंछते हुए पीठ पर गाज्यो के पुले ढोते हुए अँधेरे होने से पहले घर पहुचनें की डर और बारिश की तनिक आशंका होने पर गाज्यो को एक जगह सारकर फटाफट लुटे की तैयारी करना. इजा तैयार रहती थी कि लगभग सौ पुलों याने एक लूटा बनाना. 

इजा कभी स्कूल नहीं गयी लेकिन उसका हिसाब किताब एकदम फिट रहता था. कडाके के ठण्ड में मैं और दीदी फटी एडियों को क्रैक क्रीम के बजाय कटोरी में मोम तेल की बत्ती बनाकर चीरों(विवाइयों) को डामना (भरना). सल्ला रुख से निकले छ्युल से सुबह सुबह चूल्हा जलाना और शाम को गोपत्योल व बांज की लकड़ियों से सगढ जलाना. बेशक तू शिकायत कर सकता है कि मैं भूल गई हूँ नहीं मेंरे मुंह में अभी भी भड्डू की दाल,कूण का भात,लोहे की भाद्याली का कापा, चुड़कानी और भांग की चटनी का निराला स्वाद सोचते ही उदेख लगने लगता है. एक बात तो कहना ही भूल गयी हाँ असोज में काम की असंता लगी रहती थी उसके बावजूद शाम की रामलीला में जाने का जोश. रामलीला के 11 दिनों में भी कुछ विशेष दिन सीता का स्वयम्बर,अंगद रावन संवाद,लक्षमण शक्ति,राजतिलक के लिए पिताजी से इजाजत लेने के लिए भूमिका बनाना. और पिताजी भी इस एवज में हमसे ज्यादे काम की अपेक्षा कर काम करवा लेना. मैं और दीदी शाम की ख़ुशी के चलते फट से निपटा देते थे. कोई थकान नहीं. आज मैं खोजने लगती हूँ महीने की संक्रान्ति के दिन चावल पीसकर देलीं में एपण बनाना और त्योहारों में सिंघल और बड़े. क्यों नहीं सीखा इजा से सिंघल बनाना. इजा के हाथ के तो तेरे जैसी जीवटता और मिठास थी. 

पहाड़ तू तो मेरा दगढ़िया ठैरा. अब तेरे को ना बोलूं तो किसे बोलूं घने जंगलों में लकड़ियाँ बीनना उन जंगलों में जंगली जानवरों का हमको देखा अनदेखी करना,टेढ़े-मेड़ें संकरों रास्तों से आसानी से पार कराकर घर में इजा का भद्याली में रखा हुआ चुड़कानी भात खाकर नौले में फोंला लेकर पानी भरने की हुड़क. अच्छा तुझे लग रहा रहा होगा ना ये तो गप लगा रही होगी. सच्ची बताऊँ आज भी मैं भिटोली का इन्तजार करती हूँ. घुघुतिया,उतरैणी को उसी तरह मनाती हूँ जैसा तेरे साथ मनाया करती थी बस एक अंतर आया आज मैं उसी रौ में काले कव्वा काले कव्वा नहीं कह पाती हूँ अडोस पड़ोस के साथ कॉम्पटीशन नहीं कर पाती हूँ. बच्चों को बताती हूँ तेरे साथ तो जब तक कौआ आकर हरे पत्ते में से कुछ उठा न ले तब तक पुकारते रहा करती थी. न जाने तूने कितनी परेशानियों को धैर्य से लड़ना सिखाया. कैसे भूल सकती हूँ तेरी जीवटता को. मेरे दगडी यार पहले प्यार की तरह तेरी आत्मीयता को भला मैं कैसे भूल सकती हूँ.