Saturday, May 12, 2018

माँ के लिए


अगर हम रोक सके हैं तुम्हें अपने हिस्से के सुख

हमारी खातिर सहेजने से
अपनी पसंद की चीज़ें
छुपाकर हमारे लिए रखने से
गर्म फुल्के खिलाने को देर रात तक जागने से

अगर तुम्हें नहीं भूलने दिया कि
खाने में क्या-क्या पसंद है तुम्हें
रंग कौन से खिलते हैं तुम पर
और गाने कौन से गुनगुनाती थीं तुम कॉलेज में
किस हीरो की फैन हुआ करती थीं तुम
तो शायद हम बचा सके हैं 'माँ' के भीतर
माँ के अलावा भी जो स्त्री है उसे

'निरुपमा राय मत बनो' कहकर
जब हम खिलखिलाते हैं न
तब असल में बदलना चाहते हैं
तमाम माँओं की त्यागमयी छवि
महिमामंडन वाली माँ के पीछे नहीं छुपाना चाहते हम
खुलकर जीने वाली,
अपनी मर्जी का करने वाली स्त्री को

तुम जब जीती हो न अपने लिए भी
तब खिलता है हमारा मन
जब तुम छीनकर खाती हो आइसक्रीम
तब लगता है कि बचा सके हैं हम अपनी माँ को
उसके भीतर भी, अपने भीतर भी

तुम रसोई से में पकवान बनाने से
ज्यादा अच्छी लगती हो, कैंडी क्रश खेलती हुए
बारिश में भीगने पर डांटते-डांटते खुद भीगते हुए
अच्छी लगती हो, गलत के खिलाफ लड़ते हुए
नाराज होते हुए कि 'चुप रहना किसने सिखाया तुम्हें
लड़ जाना हर मुश्किल से मैं हूँ अभी'

तुमने ही तो सिखाया
हर सफलता पर पाँवो को जमीं पर टिकाये रखना
जीना जी भर के और जीने देना भी
तुमने सिखाया तुमसे भी लड़ लेना कभी कभी
और मना लेना भी एक-दूसरे को

तुममें तुम्हारा बचा रहना ही हमारा होना है.

Friday, May 11, 2018

और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.


जिन्दगी में किसी ख़ुदा की जरूरत नहीं. ख़ुदा आया भी अगर तो दोस्त की तरह. साथ में चाय पी, गप्पें मारीं, एक दूसरे से गिले शिकवे किये लेकिन सजदे नहीं किये. क्योंकि मोहब्बत में या दोस्ती में हम सज़दे करते थकते नहीं, लेकिन किसी की ख़ुदाई के आगे घुटने कभी टेके नहीं. जो टेके होते तो जीवन शायद थोड़ा आसान हुआ होता. यानि जीवन का यूँ पेचीदा होना खुद चुना है और इस चुनाव पर फ़ख्र है. तो ऐ दुनिया के ख़ुदाओं, खुद को ख़ुदा समझने वालों, दोस्त बनकर ख़ुदा में तब्दील होने वालों, पतली गली से निकल लो क्योंकि हम मोहब्बत के सजदे में हैं.

दोस्त बन-बन के मिले, मुझको मिटाने वाले,
मैंने देखे हैं कई रंग जमाने वाले.

मैं तो इखलाक़ के हाथों ही बिका करता हूँ
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.

Wednesday, May 9, 2018

बेटी के नाम खत


ओ लाडली,

कोई ताकीद नहीं है यह 
बस एक बात है 
इसे सुनो सिर्फ बात की तरफ 
मानने के लिए नहीं, सोचने के लिए 

जो लोग डरायें तुम्हें 
उनसे डरना नहीं, 
भिड़ने को तैयार रहना 
ताकत जुटाना 
मजबूती से लड़ना और जीतना 
लेकिन बचाए रखना एक कोना संवाद का भी
कोमलता का भी 
हो सकता है उनके भीतर कोई दोस्त मिल जाए 
वो भय जो तुम्हें दिखा रहे थे 
उनका ही कोई भय निकले वो 
और अब तक हिंसक दिखने वाले 
दिखने लगें निरीह और मासूम 

जो विनम्रता और स्नेह से आते हों पेश 
उनसे मिलना मुस्कराकर 
करना बात मधुरता से 
भरोसा करना उन पर 
उनके कहे का रखना मान भी 
कहना अपना मन भी 
लेकिन बचाकर रखना एक संशय का कोना भी 
कि न जाने विनम्रता की परत
कब उतर जाए 
और स्नेह का कटोरा फूटा निकले 
उनके कोमल स्पर्श में कांटे उगते महसूस होने लगें 
खुद को महफूज रखने के लिए 
जरूरी है बचाए जाने 
थोड़े संशय और बहुत सारा भरोसा 

#बेटियां 



Tuesday, May 8, 2018

माँ


मां
वो मुस्कुराती कम है
बहुत कम
हंसती हैं कभी-कभार लेकिन
देखा नहीं कभी
मुरझाते हुए
उदास
निराश

उसे कभी प्रेम करते हुए
भी नहीं देखा
माथे पर किसी ममत्व भरे चुम्बन की
स्मृति नहीं
न याद है
हुलस के गले लगाना
न लोरी, न लाड

उसे रोते हुए भी कम ही देखा है
न देखा है शिकायत करते कभी
देखा उसे बस काम करते,
दौड़ते-भागते

जब वो परेशान हुई
तब और काम करने लगी
शिकायत हुई कोई
तो और काम
भावुकता ने रोकनी चाही कोई राह
तो और काम

मां एक मजबूत स्तम्भ है
बिना ज्यादा किताबों में सर खपाए
वो जानती है
जीवन के रहस्य
वो समझती
कि बुध्ध होना सिर्फ
आधी रात को घर छोड़ना नहीं
न जंगलों में भटकना भर

दाल  में संतुलित नमक डालना भी है 
दुनिया में प्रेम बचाए रखने सा महत्वपूर्ण काम

मां के पास
समष्टि का समूचा ज्ञान है
जल से पतला ज्ञान
मां अपने ज्ञान को
जीते हुए
धूप में बैठकर मटर छीलती है
बेवजह खुश होने पर लगाती हैं फटकार
यही होता है हमारे लिए माँ का प्यार.  

Thursday, May 3, 2018

क्या यह कोई यूटोपिया है ?

- प्रतिभा कटियार

सोचा था कुछ ख्वाब बुनूँगी, पालूंगी पोसूंगी उन ख्वाबों को. उनकी नन्ही ऊँगली थामकर धीरे-धीरे हकीकत की धरती पर उतार लाऊंगी. फिर वो ख्वाब पूरी धरती पर सच बनकर दौड़ने लगेंगे. नफरत का शोर थमेगा एक दिन कि लोग थक जायेंगे एक-दूसरे से नफरत करते-करते. बिना जाति धर्म देखे किसी के भी कंधे पर सर टिकाकर सुस्ताने लगेंगे. सोचा था एक रोज जिन्दगी आजाद होगी सबकी किसी भी तरह के भी से, और आज़ादी के मायने नहीं कैद रहेंगे कागज के नक्शे पर दर्ज कुछ लकीरों में. सोचा था कविताओं से मिट जाएगा सारा अँधेरा एक दिन और धरती गुनगुनायेगी प्रेम के गीत. नहीं जानती थी कि यह कोई यूटोपिया है, नहीं जानती थी कि ये ख्वाब देखने वालों की आँखों को ही ख़तरा होगा एक रोज. नहीं जानती थी कि जिन्दगी को सरल और प्रेम भरा बनाने का ख्वाब इतना जटिल होगा और उसे नफरत से कुचल दिया जाएगा.



हमारे सामने जो समाज है, जो आसपास से उठता धुआं है, यह जो मानव गंध है, हथियारों की आवाजें हैं, मासूमों की कराहे हैं, जुर्म हैं, जुर्म छुपाने के इंतजामात हैं वो किसने बनाये हैं आखिर? क्या हम सब इसमें शामिल नहीं हैं. हालात के प्रति निर्विकार होना भी हालात में शामिल होना ही है. अपने प्रति हो रहे जुर्मों को न समझ पाना भी एक समय के बाद अज्ञानता नहीं मूर्खता बन जाती है.



राजनीति से परे कुछ भी नहीं, मौन भी राजनीति है, बोलना भी. किस वक़्त मौन होना है किस वक़्त चीखना है सब राजनीति है, इस राजनीति को समझना जरूरी है. हर किसी को. कोई राजनैतिक दल नहीं होते कभी इंसानों के साथ वो खड़े होते हैं अपने दलगत स्वार्थों के साथ. उनकी भाषा,उनके जुमले, उनके आंसू, उनके वादे सब झूठ है, हमें खुद खड़ा होना एक दूसरे के साथ मजबूती से ठीक उसी तरह जैसे हम खड़े थे अंग्रेजों के खिलाफ. देश के भीतर के, अपने आसपास के और कई बार तो अपने ही भीतर के दुश्मन को पहचानना होगा हमें. कि अब नहीं तो कब आखिर?



यह हमारे बच्चों के लिए जरूरी है. उनके आज के लिए उनके आने वाले कल के लिए. कैसा आज दिया है हमने अपने बच्चों को, कैसा भविष्य रख रहे हैं हम उनकी हथेलियों में क्या हम सचमुच सोच नहीं पाते? क्यों हमारी आँखों में ठूंस दिए गए दृश्य ही हमारा सम्पूर्ण सत्य बन जाते हैं और हम उन जबरन दिखाए दृश्यों के आधार पर खून खराबे पर उतर आते हैं. इससे ज्यादा दुखद क्या होगा कि हमने दर्द का बंटवारा कर लिया है. एक धर्म का दर्द दूसरे धर्म के दर्द से बदला ले रहा है. ईश्वर सो रहा है बावजूद हमारे तमाम घंटे घड़ियाल बजाने के. अल्लाह भी खामोश है सब देख रहा है चुपचाप हालाँकि अज़ान की आवाज गूंजती है वक़्त की पाबंदी के साथ.



मुझे ये दुनिया नहीं चाहिए. मैं अपने बच्चों को डर के साए में घर से विदा नहीं करना चाहती, मैं नहीं चाहती कि मेरा बच्चा किसी भी तरह की किसी से भी नफरत के करीब से भी गुजरे, इन्सान ही नहीं पशु, पक्षी प्रकृति से भी उसे हो वैसा ही लगाव जैसा मुझे है उससे. क्या यह असम्भव है? क्या हम सब ऐसा नहीं चाहते? इसके लिए कोई कानून नहीं आएगा इसके लिए हमें अपने भीतर उतरना पड़ेगा. जबरन हमारे भीतर जो बंटवारे उंच नीच, धर्म जाति स्त्री पुरुष की खाइयाँ बना दी गयी हैं हमारे जन्म से ही उसे पहले समझना होगा, उसे पाटना होगा. कि जन्म सबका धरती पर हुआ है इस धरती को खूबसूरत बनाने और पहले से खूबसूरत धरती के सौन्दर्य को जीने के लिए. शुरुआत हमको ही करनी होगी खुद से. आइये, खुद से बात करना शुरू करें बिना किसी पूर्वाग्रह के...