Friday, October 13, 2017

अक्टूबर की हथेली पर...


अक्टूबर की हथेली पर
शरद पूर्णिमा का चाँद रखा है
रखी है बदलते मौसम की आहट
और हवाओं में घुलती हुई ठण्ड के भीतर
मीठी सी धूप की गर्माहट रखी है

मीर की ग़ज़ल रखी है
अक्टूबर की हथेली पर
ताजा अन्खुआये कुछ ख्वाब रखे हैं

मूंगफली भुनने की खुशबू रखी है
आसमान से झरता गुलाबी मौसम रखा है
बेवजह आसपास मंडराती
मुस्कुराहटें रखी हैं
अक्टूबर की हथेली पर

परदेसियों के लौटने की मुरझा चुकी शाख पर
उग आई है फिर से
इंतजार की नन्ही कोंपलें
अक्टूबर महीने ने थाम ली है कलाई फिर से

कि जीने की चाहतें रखी हैं
उसकी हथेली पर
धरती को फूलों से भर देने की
तैयारी रखी है
बच्चों की शरारतों का ढेर रखा है
बड़ों की गुम गयी ताकीदें रखी हैं
उतरी चेन वाली साइकिल रखी है एक
और सामने से गुजरता
न खत्म होने वाला रास्ता रखा है
अपनी चाबियाँ गुमा चुके ताले रखे हैं
मुरझा चुके कुछ ‘गुमान’ भी रखे हैं
अक्टूबर की हथेली पर

पडोसी की अधेड़ हो चुकी बेटी की
शादी का न्योता रखा है
कुछ बिना पढ़े न्यूजपेपर रखे हैं
मोगरे की खुशबू की आहटें रखी हैं
और भी बहुत कुछ रखा है
अक्टूबर की हथेली में
बस कि तुम्हारे आने का कोई वादा नहीं रखा...

Monday, October 9, 2017

मेरी जान हो तुम प्यारी रैना...



जिंदगी के सबसे बुरे दिनों में तुम्हारा होना कीमती था, तुम न कुछ पूछतीं न मैं कुछ बताती थी फिर भी एक रिश्ता गहराने लगा था भीतर ही भीतर...रैना, तुम्हारा सिर्फ नाम लिखती हूँ और एक संसार खुलने लगता है.

उस शहर में तुम्हारा होना उन दिनों सिर्फ मेरे लिए ही था मानो...बाहर के युद्ध लड़ लेना आसान होता है भीतर के मुश्किल...तुम्हारा साथ मेरे भीतर के युध्ध में मेरा साथ दे रहा था....करियर के सबसे काले दिनों में एक तुम ही उजाला थीं...तुम्हारी दिप दिप करती मुस्कुराहट मेरा हाथ थामे रहती थी.

कभी मेरी गोद में तुम्हारा यूँ ही सर रख कर बैठ जाना, कभी चुप से बगल में आकर खड़े हो जाना कितनी ताकत देता था कितनी ऊर्जा समेट देता था. कानपुर मेरे लिए बहुत बुरी यादों का शहर है जिसमें सिर्फ तुम इकलौती सुख की याद हो...तुम्हें मैंने बहुत सहेज कर रखा है...

नाराज़ मत हो तुम अब भी मेरी पहली 'प्यारी चुड़ैल' हो...लव यू...जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान! 

Monday, October 2, 2017

चोटिल चन्द्रमा चल रहा है- डॉ. स्कंद शुक्‍ल


डॉ. स्कंद  शुक्‍ल को पढ़ना अलग तरह का अनुभव देता है. संवेदना, ज्ञान और जानकारियों का ऐसा सामंजस्य अमूमन कम ही देखने को मिलता है. और भाषाई कौशल तो है ही. यूँ तो वो रुमेटोलॉजिस्ट और इम्यूनोलॉजिस्ट हैं
लेकिन उनकी लेखनी ने उन्हें दिलों का डॉक्टर बना रखा है. उनकी बातों से कई बार मेरी असहमतियां भी होती हैं लेकिन उनके लिखे का आकर्षण असहमतियों का सौन्दर्य बढ़ाता ही है....पाठक होने के अलावा उनसे एक और रिश्ता है मेरा वो है लखनऊ का रिश्ता. आज 
स्कंद  शुक्ल ने अपनी कहानी 'प्रतिभा की दुनिया 'के लिए देकर उन्होंने इस लखनवी रिश्ते को मान दिया है.- प्रतिभा
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ढेला किसी मेढक-सा उस झील की सतह पर उछलता निकल गया था। दो-तीन-चार छलाँगें और गुडुप्प !
"कहाँ तक पहुँचाना है ?" मैंने पूछा था।
"और आगे ?"
"कितना आगे ?"

उसने आँखें उचकायीं मानो किसी तरुण हंसिनी ने अपने पंख फैलाये हों। चेहरे पर उड़ान।

"फेंका गया पत्थर नीचे क्यों आता है, विधु ?"
"क्योंकि धरती उसे खींच लेती है।"
"क्यों खींच लेती है ?"
"क्योंकि उसमें गुरुत्व है।"
"तो तुरन्त क्यों नहीं खींचती ?"
"क्योंकि तुमने उसमें अपने हाथ की ताक़त भरी है। जब तक उसमें तुम्हारी दी ऊर्जा है , वह धरती के ऊपर किसी पक्षी-सा उड़ रहा है। और फिर धीरे-धीरे नीचे-नीचे , और नीचे और धड़ाम।" मैं अपनी मुट्ठी को हथेली पर गिराता हूँ।

"तो सारा मामला खिंचावों के बीच लड़ाई का है। कौन किसे कितना खींच ले जाए।"
"हाँ।"
उसे इतनी छोटी सहमति नहीं चाहिए थी।
"तो अगर किसी कंकड़ को आसमान की सैर करानी हो इस तरह कि वह घर ही न लौटे तो क्या करें ?"
"तो इतनी तेज़ फेंको कि धरती उसे वापस न खींच पाये। वह जाए , जाए , जाए और धरती का एक पूरा चक्कर लगा आए। चाँद की तरह।"
"चाँद धरती का चक्कर लगाता है न। रोज़। लेकिन गिरता नहीं कभी।बस दिखता है। घूमता हुआ। रात को। कभी पूरा , कभी आधा। कभी पतला , कभी मोटा।

चाँद नहीं गिरेगा। क्योंकि वह घूम रहा है धरती के चारों ओर। उसकी माशूक़ा गोल है। वह ख़ुद भी गोल चक्कर लगा रहा है। वह धरती पर गिरता हर दिन है , लेकिन पहुँचता नहीं उस पर। यही विधु-वसुधा की कथा का वर्तुल है। जिसमें गोल देह हैं , गोल रास्ते हैं और कभी न मिलने , केवल देखने की सुखद विडम्बना।"
"सुखद विडम्बना ?"
"हाँ , सुखद विडम्बना। चाँद रुक गया तो वह धरती के गले लग जाएगा। और मर जाएँगे हम-सब। धरती निपूती हो जाएगी।"
वसुधा का ढेला अबकी बार बहुत दूर गया है। दूर , बहुत दूर। पानी को बिना छुए। और फिर ओझल। न जाने कहाँ। तभी वह झील के उस पार के पेड़ों की ओर इशारा करती है।
"वह देखो। मैंने अपने नन्हें मुसाफ़िर को चाँद पर पहुँचा दिया। अब वह कभी नहीं लौटेगा। घूमता रहेगा सदा चारों ओर अपनी धरती के।"

चाँद काले पेड़ों के पार से लुकछिप कर झाँक रहा था। उसकी देह पर एक और नये पत्थर की मार थी...

Thursday, September 28, 2017

शरद, शाम, साहिर और सप्तक



हजारों गम हैं इस दुनिया में अपने भी पराये भी...मोहब्बत ही का गम तनहा नहीं हम क्या करें...जब भी जिन्दगी के झंझावात उलझाते हैं साहिर के शब्द आसपास ही मंडराने लगते हैं...साहिर महबूब शायर हैं...मन की बात समझते हैं...मन के हर मौसम से उनका लिखा कुछ न कुछ टकरा ही जाता है...ऐसा ही आज भी हुआ.

कई दिनों से मन बेहद उदास है और फुर्सत रत्ती भर नहीं है...तो उदासी की गठरी सर पर लादे लादे भटकती फिर रही हूँ...न मिलने वाली फुर्सतों  की यह अच्छी बात होती है कि वो आपकी उदासी भी आपसे छीन लेने को बेताब होती हैं...हालाँकि इसके एवज में कई बार चिड़चिड़ाहट साथ हो लेती है.

उतरते शरद के बीच मन का मौसम ऐसा बेढंगा हो यह जरा कम जंचने वाली बात तो है ही...तो आज की सुबह उतरी अपने साथ साहिर को लेकर...दोस्त चन्दर वर्मा की लिखी किताब 'साहिर और मैं' कबसे रास्ते में थी और जब मिली तो खूब मिली...महबूब शायर हैं साहिर उनकी किताब का आना कितना सुख दे गया बता नहीं सकती. हालाँकि यह किताब को सिर्फ पाने का सुख है...पढने का सुख अभी पूरा बाकी है...

दुनिया आज नवरात्र में कन्या जिमाने में लगी थी इसी बीच कुछ लोगों ने भगत सिंह को भी याद किया...भागते दौड़ते जेहन में कभी भगत सिंह, कभी साहिर चलते रहे....कि इसी बीच स्वाति ने आवाज़ दी कि आज लता जी का जन्मदिन है और इस मौके पर लता की सुर साधना का दसवां बरस...दस साल पहले लता की सुर साधना की पहली महफिल जमी थी उत्तर प्रदेश के उन्नाव में...तब भी स्वाति ने आवाज दी थी...तब नहीं पहुँच पायी थी...लेकिन उसके बाद जब भी मौका मिलता है ज़रूर जाती हूँ...

स्वाति खूब मेहनत करती है...संगीत उसका इश्क़ है...मगरूर इश्क...उसी में रमे रहना उसे भाता है...बचे हुए वक़्त में यायावरी करती है...जिन्दगी में और कोई उलझन उसने रखी ही नहीं...मुझे उसकी यह संगीत से, प्रकृति से, जिन्दगी से आशिक मिजाजी बहुत पसंद है...इसी आशिक मिजाजी से उपजी आज की शाम भी. उसकी मिश्री सी आवाज़ में सुनना ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें...इस दिलफरेब मौसम से मिलवा गया...

आज की यह महफ़िल महबूब शायर साहिर के करीब ले जाने की शाम थी...नन्हे पौधों को पेड़ बनते देखने की शाम थी, सुकून की शाम थी...

अब सिरहाने शरद का चाँद  है, हाथ में साहिर हैं और अभी-अभी बीती संगीत की प्यारी सी खुशनुमा शाम की मीठी सी याद है...ओह शरद...तुम मिल ही गए आखिर...साहिर के बहाने...लता जी के बहाने...सप्तक  के बहाने...

(शरद, साहिर, लता और इश्क शहर )

Wednesday, September 27, 2017

सुनो बेटियों, इनकार कर देना बनने से देवी



सुनो बेटियों,

हवाओं को चूमने से सकुचाना नहीं 
हरहराने देना अपने भीतर की नदी को
जी भर के 

खिलना तो इस कदर
कि हैरान हो जाए कुदरत भी 
और जब मिलना किसी से तो 
मिलने को देना नए अर्थ 
जिन्दगी तुम्हारी है यह भूलना मत 
कि जिंदगी के सारे सुख हैं तुम्हारे लिए भी 

चलना, गिरना, उठना फिर चलना
घबराने की बात नहीं
ढब है जीने का

रास्ते नहीं होते हमेशा कहीं पहुँचने के लिए
होते हैं भटकने के लिए भी 
भटकते हुए नये रास्तों की तलाश का सुख लेना और 
दुनिया के बनाये सही गलत वाले खांचों पर  
कट्टम कट्ट करके खिलखिलाना जोर से 

जीतना कोई मजेदारी नहीं
किसी की मुस्कुराहट पर
जिन्दगी हार जाने का सुख भी लेना
और दिलों को जीत लेने का भी

अपने 'खुद' को खंगालना बार-बार
बहुत चुपके से हमारी 'खुद की मर्जियों' में
शामिल हो जाती हैं जमाने की मर्जियां

तुम्हारी ख़ुशी तुमसे हो 
तुम्हारे दुःख भी हों तुमसे ही 
अपने  खुद के सुख दुःख कमाना
 कोई स्वार्थ नहीं
 जीवन है 

मत बढ़ाना अपने पाँव किसी पूजन-वूजन के लिए
इनकार कर देना बनने से देवी
और किसी को देवता बनाने से भी 
कि इन्सान होने से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं

माथे पर रोली लगाने को बढ़ते हाथों से कहना 
हमें आधी रात को भी
सड़कों पर घूमने की आज़ादी चाहिए
अपने सपनों को जीने की आज़ादी
यह पूजा अर्चन नहीं

कोई हक दिए जाने का इंतजार किये बगैर
खुद निकल पड़ना अपनी जिन्दगी की तलाश में 

फूंक मारकर उड़ा देना
दैहिक प्रशंसाओं वाले
या त्याग समर्पण की देवी वाले जुमलों को 
कि अपने हक के लिए आवाज उठाने से ज्यादा
सौन्दर्य कहीं नहीं
अपनी मर्जी के सफ़र पर निकल पड़ने से बड़ा
सुख कोई और नहीं...

Sunday, September 17, 2017

प्यारी सी है सिमरन...


 अगर बात सिर्फ बंधनों को तोड़ने की है तो यह बात जरूरी है लेकिन बात जब बंधनों को पहचानने की हो तो और भी ज़रूरी हो जाती है. सही गलत सबका अपना होता है ठीक वैसे ही जीवन जीने का तरीका भी सबका अपना होता है. भूख प्यास भी सबकी अपनी होती है, अलग होती है. हमारा समाज अभी इस अलग सी भूख प्यास को पहचानने की ओर बढ़ा नहीं है. सिमरन उसी ओर बढती हुई एक अच्छी फिल्म है.

जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है. 

शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती  है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना  बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में. 

वो अपने पिता से कहती है, 'हाँ मैं गलतियां करती हूँ, बहुत सी गलतियां करती हूँ लेकिन उन्हें मानती भी हूँ न'. वो जिंदगी का पीछा करते-करते कुछ गलत रास्तों पर निकल जाती है मुश्किलों में फंसती चली जाती है लेकिन हार नहीं मानती। उसकी संवेदनाएं उसका साथ नहीं छोड़ती। बैंक लूट के वक़्त जब एक सज्जन को दौरा पड़ता है तो उन्हें पानी पिलाती है.' बैंक लूट की घटना के बाद किस तरह ऐसे अपराधों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार मान लिए जाने की आदत है लोगों में इस पर अच्छा व्यंग्य है साथ ही एक मध्यमवर्गीय भारतीय पिता की सारी चिंता किसी भी तरह बेटी की शादी पर ही टिकी होती हैं इसको भी अंडरलाइन करती है फिल्म।

सिमरन एक साफ़ दिल लड़की है. छोटे छोटे सपने देखती है, घर का सपना, जिंदगी जीने का सपना, शादी उसका सपना नहीं है, वो प्यार के नाम पर बिसूरती नहीं रहती लेकिन किसी के साथ कोई धोखा भी नहीं देती। गलतियों को जस्टिफाई नहीं करती, उनसे बाहर निकलने का प्रयास करती है. प्रफुल्ल के किरदार को कंगना ने बहुत प्यार और ईमानदारी से निभाया है. फिल्म शादी, ब्वॉयफ्रेंड, दिल टूटने या जुड़ने के किस्सों से अलग है. तर्क मत लगाइये, सही गलत के चक्कर में मत पड़िये बस कंगना से प्यार हो जाने दीजिये।

पिछले दिनों अपने बेबाक इंटरव्यू को लेकर कंगना काफी विवाद में रही है. विवाद जो उसकी साफगोई से उपजे। कौन सही कौन गलत से परे एक खुद मुख़्तार लड़की कंगना ने अपना मुकाम खुद बनाया है.... उसकी हंसी का हाथ थाम लेने को जी करता है, सब कुछ भूलकर जिन्दगी को जी लेने को दिल करता है.  


Friday, September 1, 2017

ताप, बारिश, इश्क शहर


देह पर से ताप यूँ गुजर रहा है
जिस तरह तुम्हारी याद गुजरती है
उनींदी आँखों की कोरों से
टप्प से टपक जाने से ठीक पहले

कानों में बारिशें किसी राग सी घुल रही हैं
मध्धम मध्धम
हरारत भरी आँखों में शरारत घुल रही है
बारिश के आगे फैलाई हथेलियों पर
गिरती हैं हल्की गर्म सी बूँदें
जैसा बारिश ने लिया हो हथेलियों का बोसा

बारिश में भीगे रास्ता भटककर मुंडेर पर आ बैठे पंक्षी
कनखियों से देखते हैं बारिश को भी मुझे भी
कि उनको अपने स्पर्श की गर्माहट देना चाहती हूँ
वो भी शायद करीब आने को आकुल हैं

देह पर से ताप यूँ ही नहीं गुजर रहा है
गुजर रहा है बहुत कुछ संग संग...

Tuesday, August 29, 2017

उठो न शहर गोरखपुर


सुनो गोरखपुर,

कब तक उठाते रहोगे अपने कन्धों पर
मासूमों की लाशें
कब तक अव्यवस्थाओं को
अपना चेहरा बना रहने दोगे

कब तक 'गोरख्पुरिये' शब्द को
अजीब तरह से इस्तेमाल होते देखते रहोगे
और कब तक कुछ भी हो जाने पर भी
चैन से करवट लेकर सोते रहोगे
कब तक मासूमों की मौतों को
आंकड़ों में तब्दील होते देखते रहोगे

बोलो शहर,
क्या तुम्हारे सीने में कोई दर्द की लहर नहीं उठती
कोई ज्वालामुखी नहीं फूटता
क्या सचमुच तुम्हारा जी नहीं करता कि
मासूमों की सांसों को तोड़ देने वाली सरकारों की
धज्जियाँ उड़ा दी जाएँ

बोलो शहर
अगस्त को बच्चों की मौत का महीना कहकर
पल्ला झाड़ने वालों से तुम्हें कोई शिकायत नहीं

सुनो फ़िराक गोरखपुरी के शहर के वाशिंदों
जरा अपनी आत्मा में अकुलाहट भरो
जरा निवाला तोड़ने से पहले
उन मासूमों के चेहरे याद करो जो
बरसों से वक़्त से पहले विदा होते जा रहे हैं
जरा चैन से अपने घरों में चादर ओढकर सोने से पहले
उन माओं की आँखों को याद कर लो
जो बरसों से सोयी नहीं हैं

उठो न शहर गोरखपुर
कि तुम्हारी चुप्पी अब असहनीय है....


(यह कोई कविता न समझी जाय. यह कुछ न कर पाने की कुंठा है और जो हो रहा है उसके प्रति गुस्सा है )

Sunday, August 20, 2017

चलो न जी लेते हैं....


घर की दहलीज़ लांघना आसान नहीं होता, जाने कितनी पुकारें रोकती हैं, जाने कितने दर्द, कितनी जिम्मेदारियां. कैसा कच्चा पक्का सा होता है मन. लेकिन शो मस्ट गो ऑन की तर्ज़ पर निकलना ज़रूरी होता है और निकलने का उपाय निकलना ही होता है सो चल पड़े थे सफर को फिर एक बार...छतीसगढ़, रायपुर.

ऐसा हड़बड़ी का दिन था कि दवाइयां रखना तो याद रहा लेकिन बहुत कुछ छूट भी गया, एयरपोर्ट जाकर याद आया कि मोबाइल भी छूटा है...एक ही मिनट की बेचैनी थी बस....उसके बाद से असीम शांति है...पहली बार इतने दिन बिना मोबाईल के हूँ.

सुबह बिटिया को स्कूल छोड़ने जाते वक़्त एक्सीडेंट होते-होते बचने से शुरू हुआ वो दिन मोबाईल घर पर छूटने भर पर नहीं रुका. रायपुर पहुँच कर पता चला कि मेरा सामान भी जाता रहा. एक जैसे ट्रैवेल बैग थे तो एयरपोर्ट पर बेल्ट से कोई और सज्जन मेरा बैग अपना समझ के ले गए. (हालाँकि तमाम लिखत पढ़त और पड़ताल के बाद सामान अगले दिन वापस मिल गया)

दोस्तों के होते जिन्दगी में कभी कुछ कमी रही ही नहीं, देवयानी का सामान उसके कपडे सब उससे पहले मेरे हो गए एक पल भी न लगा.

सुबह की हथेलियों में सारी परेशानियों का ईनाम था.आँख खुली और खुद को किसी गहरे हरे समंदर के बीचोबीच पाया.....इतना हरा, इतना हरा...उफ्फ्फ.

धमतरी में हमारा ऑफिस किसी ख़्वाब सा मालूम होता है, ऑफिस होते हुए भी ऑफिस लगता नहीं. कोना-कोना जिस लाड़ से जिस स्नेह से सजाया गया है, जिस तरह हर कोना अपने पास रोक लेता है वह एहसास कमाल है. नवनीत बेदार और उनकी टीम ने इसे काम की तरह नहीं इश्क की तरह अंजाम दिया है...दे रहे हैं...हम उनके इश्क को महसूस कर रहे हैं.

देवयानी लम्हों को सहेजना जानती है, मेरे पागलपन के सुर में सुर लगाना जानती है. धान के खेतों में हवा से बनती लहर को देखना किसी जादू को देखने सा मालूम होता है..घंटों ताकते रहने को जी चाहता है, बहुत सारा चुप रहने को जी चाहता है, बोलने से हवा की लय न टूट जाए कहीं...हम उसे छेड़ना नहीं चाहते...बस जीना चाहते हैं...अभी इस हरे समंदर में डुबकियां ले रही हूँ...आवाज कोई नहीं है आसपास...एक ख़ामोशी तारी है...भीतर कुछ खाली हो रहा है, कुछ भर रहा है...

छुटपुट बतकहियाँ भी हैं, किस्से हैं, जेएनयू के किस्से ऐसे कि आँखें भीग जाएँ...और प्यार हो जाए जेएनयू से, उन सब दोस्तों से जो हैं आसपास और जो हैं जिक्र में...

जिन्दगी कितनी खूबसूरत तो है...चलो न इसे जी लेते हैं....इन खूबसूरत लम्हों में तनिक मर ही लेते हैं....

(धमतरी डायरी, 19 अगस्त 2017 )

झूम रहे हैं धान हरे हैं- जन्मदिन मुबारक कवि त्रिलोचन

हरा भरा संसार है आँखों के आगे
ताल भरे हैं, खेत भरे हैं
नई नई बालें लहराए
झूम रहे हैं धान हरे हैं
झरती है झीनी मंजरियाँ
खेल रही है खेल लहरियाँ
जीवन का विस्तार है आँखों के आगे

उड़ती उड़ती आ जाती है
देस देस की रंग रंग की
चिड़ियाँ सुख से छा जाती हैं
नए नए स्वर सुन पड़ते हैं
नए भाव मन में जड़ते हैं
अनदेखा उपहार है आँखों के आगे

गाता अलबेला चरवाहा
चौपायों को साल सँभाले
पार कर रहा है वह बाहा
गए साल तो ब्याह हुआ है
अभी अभी बस जुआ छुआ है
घर घरनी परिवार है आँखों के आगे
(रचना-काल - 28-10-48)


Saturday, August 19, 2017

वो देर से पहुंचा था लेकिन वक़्त पे पहुंचा



आपके सारे जन्मदिन हमारे ही जन्मदिन हैं न गुलज़ार साहब....कि चाँद पुखराज ही तो था जिसके एवज में आपका पहला रूमानी ख़त सा खत मेरे नाम का. वो कच्ची सी उमर में लफ़्ज़ों की नरमी को महसूसने की शुरुआत ही थी शायद. वो महसूसने के समन्दर में उतरने की अल्हड उमर थी और था चाँद पुखराज का. वो आपसे हुई पहली मुलाक़ात...कमरे के बाहर से झांकती दो कच्ची उमर की ख्व़ाब भरी आँखें थीं...जिनमें आपसे मिलने की ख्वाहिश थी, आपको एक नज़र देख लेने की चाहत. कैसी चहकती सी अदा में आपने इशारे से अंदर आने को कहा था....नायकीनी सा यकीन था...कि सामने गुलज़ार बैठे थे...मेरे वाले गुलज़ार, चाँद पुखराज वाले गुलज़ार, बल्लीमारान की गलियों का पता मुठ्ठियों में लिए घूमने वाले गुलज़ार और मुझे मेरे जीवन का पहला ख़त भेजने वाले पहले इन्सान गुलज़ार...मैं ज़ार-ज़ार रो रही थी..सिर्फ आंसू थे, हिचकियाँ थीं, सिसकियाँ थीं...और आप अपने शफ्फाक कुरते पाजामे में दोनों हाथ ऊपर उठाकर शायद कोई दुआ पढ़ रहे थे...जितना मैं रो रही थी उतना ही आप शुकराना कर रहे थे शायद. आप मुझे पानी पिला रहे थे...सर पर हाथ फेर रहे थे, चुप करा रहे थे...लेकिन मेरा रोना था कि सिमटने को न आता था...हालाँकि दिन सिमटने को आ पहुंचा था...

मिस कटियार अब चुप हो जाइए न...ऐसा ही कहा था आपने...और मेरी डायरी में एक शेर दर्ज किया था मेरे लिए...उसके बाद अगले दिन जब होटल ताज की लौबी में आपसे सामना हुआ था तो आपकी भीड़ को चीरती आवाज़ ने कहा था, ‘मिस कटियार, अब मत रोइयेगा’ और मैं और आप दोनों ही हंस दिए थे...वो लम्हे अब भी वैसे ही ताजे हैं...वक़्त के आले में वैसे ही सजे हुए हैं...

उसके बाद आपसे कई बार मिलना हुआ ऑस्कर वाली रात के ठीक पहले भी...वैलेंटाइन डे के रोज़ भी...आपका दिया पीला गुलाब अब भी सहेजा हुआ है, आपका वो मिस कटियार कहकर पुकारना अब भी कानों में मुस्कुराता है. हर मुलाकात में आपके हाथों से उर्दू में दर्ज एक शेर मेरे साथ रहता है...

आपके जन्मदिन पर मेरे दोस्त जब मुझे बधाई देते हैं तो लगता है कुछ ख़ास है मेरा और आपका रिश्ता...

सनसेट प्वाइंट की यह कहानी अब भी सुनती हूँ, तब भी सुनती थी जब कैसेट की रील घिसकर टूट जाया करती थी...जानते हैं मेरे घर की बालकनी भी सनसेट प्वाइंट ही है इन दिनों...

(18 अगस्त, एक क़तरा याद )

Thursday, August 17, 2017

कमजोर - अंतोन चेखव

आज मैं अपने बच्चों की अध्यापिका यूलिमा वार्सीयेव्जा का हिसाब चुकता करना चाहता था।

''बैठ जाओ, यूलिमा वार्सीयेव्जा।'' मेंने उससे कहा, ''तुम्हारा हिसाब चुकता कर दिया जाए। हाँ, तो फैसला हुआ था कि तुम्हें महीने के तीस रूबल मिलेंगे, हैं न?''

''नहीं,चालीस।''

''नहीं तीस। तुम हमारे यहाँ दो महीने रही हो।''

''दो महीने पाँच दिन।''

''पूरे दो महीने। इन दो महीनों के नौ इतवार निकाल दो। इतवार के दिन तुम कोल्या को सिर्फ सैर के लिए ही लेकर जाती थीं और फिर तीन छुट्टियाँ... नौ और तीन बारह, तो बारह रूबल कम हुए। कोल्या चार दिन बीमार रहा, उन दिनों तुमने उसे नहीं पढ़ाया। सिर्फ वान्या को ही पढ़ाया और फिर तीन दिन तुम्हारे दाँत में दर्द रहा। उस समय मेरी पत्नी ने तुम्हें छुट्टी दे दी थी। बारह और सात, हुए उन्नीस। इन्हें निकाला जाए, तो बाकी रहे... हाँ इकतालीस रूबल, ठीक है?''

यूलिया की आँखों में आँसू भर आए।

"कप-प्लेट तोड़ डाले। दो रूबल इनके घटाओ। तुम्हारी लापरवाही से कोल्या ने पेड़ पर चढ़कर अपना कोट फाड़ डाला था। दस रूबल उसके और फिर तुम्हारी लापरवाही के कारण ही नौकरानी वान्या के बूट लेकर भाग गई। पाँच रूबल उसके कम हुए... दस जनवरी को दस रूबल तुमने उधार लिए थे। इकतालीस में से सताईस निकालो। बाकी रह गए चौदह।''

यूलिया की आँखों में आँसू उमड़ आए, ''मैंने सिर्फ एक बार आपकी पत्नी से तीन रूबल लिए थे....।''

''अच्छा, यह तो मैंने लिखा ही नहीं, तो चौदह में से तीन निकालो। अबे बचे ग्यारह। सो, यह रही तुम्हारी तनख्वाह। तीन,तीन... एक और एक।''

''धन्यवाद!'' उसने बहुत ही हौले से कहा।

''तुमने धन्यवाद क्यों कहा?''

''पैसों के लिए।''

''लानत है! क्या तुम देखती नहीं कि मैंने तुम्हें धोखा दिया है? मैंने तुम्हारे पैसे मार लिए हैं और तुम इस पर धन्यवाद कहती हो। अरे, मैं तो तुम्हें परख रहा था... मैं तुम्हें अस्सी रूबल ही दूँगा। यह रही पूरी रकम।''

वह धन्यवाद कहकर चली गई। मैं उसे देखता हुआ सोचने लगा कि दुनिया में ताकतवर बनना कितना आसान है।


Wednesday, August 9, 2017

शुक्रिया हैदराबाद !




आप कितना ही सफर तय कर लें जिन्दगी में लेकिन पहले कदम की याद पूरे सफर में तारी रहती है...जब भी किसी सफ़र की ओर कदम बढाती हूँ पहले कदम की याद जरूर आती है. पहली बार कोई निर्णय लिया था खुद से. सबकी इच्छा के विरुद्ध, किसी की परवाह किये बगैर. वो बड़े ऊबे से, घुटन भरे से दिन थे. पता नहीं था कि वजह क्या है लेकिन भीतर मानो कोई धुआं सा भरा था. कोई कुहासा जिसे बाहर आने की राह नहीं मिल रही. यूँ मालूम होता था कि सांस भी बड़ी मुश्किल से ली जा रही हो...उन दिनों में ही मास कम्युनिकेशन के छात्रों को पढाना शुरू किया था. असल में वो उस घुटन उस कुहासे से निकलने का प्रयास था जो बहुत काम आया. पढ़ाया क्या ये तो पता नहीं लेकिन सीखा बहुत अपने छात्रों से.

2006 की बात है. कुछ छात्र हैदराबाद जा रहे थे, ईटीवी में इंटरव्यू देने. उन्होंने कहा, मैम आप भी चलिए न साथ. मेरे लिए इस तरह का कोई ऑफर ही बहुत अलग सा अनुभव था. अकेले इत्ती दूर बिना किसी वजह के, बिना किसी काम के. लेकिन अंदर से तीव्र इच्छा हुई कि चल ही दूं बस. उन दिनों बेरोजगार थी. या यूँ कहिये माँ होने की नौकरी चुनकर दूसरी नौकरी को छोड़कर बैठी थी तो छुट्टी वुट्टी लेने का कोई चक्कर नहीं था. लेकिन एक बहुत बड़ा विकराल प्रश्न था सामने कि घर में क्या कहूँगी, इज़ाजत कैसे मिलेगी. और जब इज़ाज़त नहीं मिलेगी तो पैसे कैसे मिलेंगे? खैर समस्याएँ भी थीं और एक सहमी सी इच्छा भी...

उन दिनों ज्योति बैंगलोर में थी और उसकी दीदी गुडिया दी (मेरी भी दीदी) हैदराबाद में थीं, बस यही सहारा बना कि ज्योति से मिलने जाना है. कुछ अनुवाद का काम किया था तो कुछ पैसे थे हाथ में...तो टिकट करा लिया गया. ट्रेन में स्लीपर में हैदराबाद...वहां से बैगलोर जाना था.

मुझे याद है उस वक़्त घर का कोई भी सदस्य खुश नहीं था. आधे रास्ते तक झंझावात घेरे रहे, सफ़र पूरा होता रहा....लेकिन भीतर कुछ भी शांत नहीं था. फोन पर ठीक से कोई बात नहीं करता था...जैसे हम किसी अपराध में लिप्त हों.

हम घूम रहे थे, हुसैन सागर के किनारे घंटों टहलते, मेरे छात्र बेटू को घुमाने ले जाते मस्ती करते, गुडिया दी जीजा जी भी हैदराबाद को झोली में भर देने को व्याकुल थे, पहली बार परिवार के बगैर एक अलग दुनिया में थी...लेकिन जिससे भागकर आई थी वो लगातार उंगलिया थामे रहा...हैदराबाद से तब भी बहुत प्यार मिला था. आत्मविश्वास मिला था.

लौटकर आई तो मेरे भीतर बहुत कुछ बदल चूका था. मैंने अब अकेले निकलना सीख लिया था. खुद टिकट बुक करना सीख लिया था. अब आर्थिक मजबूती और आत्मविश्वास को सहेजना था. यूँ तो ग्रेजुएशन के बाद से ही आमदनी शुरू हो चुकी थी पहले फ्री लांसिंग की फिर नौकरी की लेकिन वो आमदनी परिवार की साझा आमदनी थी इसलिए हर खर्च का जवाब देना होता था. अब नए सिरे से अपने लिए बिना जवाबदेही वाला कमाना था. हैदराबाद से लौटकर आई तो नए आत्मविश्वास से नए सिरे से नौकरी की तलाश शुरू की और जल्द ही दैनिक जागरण में नौकरी मिल गयी.

समय बदल चुका है. अब खूब घूमती हूँ, किसी भी वक्त कहीं भी आ जा सकती हूँ. आवारापन जिन्दगी का हिस्सा बना रखा है, बेटू समझदार है वो आवारा होने देती हैं, खुश होती है माँ को घूमते देखकर.

'क' से कविता हैदराबाद की पहली सालगिरह में शामिल होने को जब प्रवीन और मीनाक्षी ने आवाज दी तबसे वो पहली यात्रा की स्मृतियों की पोटली खुलने लगी...हैदराबाद मेरे लिए मुक्ति की पुकार का शहर है, आत्मविश्वास को सहेज देने वाला शहर है, गमों को फूंक मारकर उड़ा देने वाला शहर है. इस शहर के सीने से लगकर रोने का बहुत मन था. इस शहर को शुक्रिया बोलने का बहुत मन था, इस शहर से कहना था कि तुमने मुझे जिन्दगी की बागडोर थामना सिखाया है...ये शहर चुपके से सब ठीक कर देता है...'क' से कविता एक ख्वाब था उस ख्वाब को पंख लगाकर यूँ हैदाराबाद के आसमान पर उड़ते देखने का सुख आज बोनस है...

प्रवीन और मीनाक्षी शायद जानते भी नहीं कि उन्होंने मुझे क्या क्या दिया है और कितना समृद्ध किया है ठीक उसी तरह जिस तरह गुडिया दी, हरनीत, आशीष, प्रणय (जो अब इस दुनिया में नहीं है) विक्रांत, नवीन नहीं जानते कि उस वक़्त में उनका साथ कितना कीमती था...हाँ ज्योति सब जानती है.

उस बार (2006 में ) शहर ने मेरी नाउम्मीदीयों को किनारे लगाया था, इस बार आत्मविश्वास को परवान चढ़ाया है...हैदराबाद मेरी जिन्दगी में हमेशा ख़ास था और ख़ास रहेगा...इस शहर की अनुषा, सुदर्शन, सारिका, गजाला, शारदा, सलीम साहब,आचार्य नन्द किशोर, ऋषभ देव जी ये सब अब अपनों में शामिल लोग हैं...

हाँ हैदराबाद मेरा अपना शहर है...मेरा भी वहां एक घर है...

शुक्रिया हैदराबाद !

Thursday, July 27, 2017

जंग जहाँ भी है उसे हटाना होगा



हमने हाल ही में प्रोफेसर यशपाल को खो दिया है. यह देश का बड़ा नुकसान है. उनके विचारों को सहेजकर ही हम उन्हें सच्ची श्रधांजलि दे सकते हैं. वैज्ञानिक सोच की आज कितनी जरूरत है यह हम आसपास के माहौल से देख सकते हैं. हम अपने वैज्ञानिकों का, अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने वालों का कितना साथ देते हैं, कितना तड़प उठते हैं जब अन्धविश्वास के खिलाफ जिन्दगी भर काम करने वाले वैज्ञानिक की सरेआम हत्याएं होती हैं. वो तड़प का न होना ही आज सरेआम किसी को भी पीटकर मार दिए जाने में तब्दील हो ही रहा है. सोचने, समझने, तर्क करने और महसूस करने की हमारी निजी क्षमताओं पर किस तरह सत्ताएं कब्ज़ा करती हैं. किस तरह किसी का सोचा हुआ हमें हमारा निजी विचार लगने लगता है और हम उसके लिए लड़ते हुए किसी की हत्या तक करने को औचित्यपूर्ण मानने लगते हैं. शिक्षा को सत्ताओं ने हमेशा से मोहरा बनाया, वही घोलकर पिलाया जो उनके हित में था. हर सत्ता की पहली नज़र किताबें बदलने पर होती है, हालात बदलने पर नहीं. कि चेतन व्यक्तित्व सत्ताओं के लिए खतरा हैं, यह बात सत्ताओं को पता है. हमारी चेतना को सदियों से गुलाम बनाने का खेल जारी है...कठपुतलियों की तरह हम बस उछल रहे हैं.

यह बुरा समय है, शिक्षा से इन सबके लिंक जुड़े हैं. हमारी शिक्षा हमें कैसा बना रही है. क्या है ऐसे शिक्षित होने के अर्थ जिसके बाद अमरनाथ यात्रियों पर हुआ आतंकी हमला हिन्दुओं पर मुसलमानों के हमले के तौर पर देखा जाता है. हम इन्सान होने की बजाय हिन्दू मुसलमान, ब्राह्मण, दलित, पुरुष, स्त्री के समूहों में बंटते जा रहे हैं. संस्कृति की रक्षा के नाम पर परम्पराओं को सहेजने के नामपर अंधविश्वासों की परवरिश हो रही है. यह कैसी शिक्षा है जिसमें शिक्षिकाएं करवाचौथ के व्रत पर सरकारी छुट्टी होने पर खुश होती हैं बजाय इसका विरोध करने के. क्या सरकारें यह कहना चाहती हैं कि सभी महिलाओं को अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखने के लिए छुट्टी देकर वो उनका साथ दे रही हैं या वो सरकारें राज्य के तमाम पतियों की उम्र बढ़ने के अनुष्ठान में सरकारी आहुति डाल रही हैं. 

जो विज्ञान के छात्र है, शिक्षक हैं, वैज्ञानिक हैं वो भी अंध विश्वासों से मुक्त नहीं हैं फिर वो छात्रों को कैसे मुक्त कर सकेंगे भला. जबकि दूसरी ओर धर्म के ठेकेदारों ने विज्ञान के महत्व को समझा और उसे अपने स्वार्थ के मुताबिक गोल-मोल करके इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. आज तमाम प्रवचन वैज्ञानिकता की चाशनी में लिपटे हुए हैं लेकिन तमाम विज्ञान की कक्षाएं धर्म से डरी हुई हैं. श्रधांजलि देने की औपचारिकता से बेहतर है की अपने भीतर की रूढ़ियों पर नजर डाली जाय. उन्हें तोड़ा जाय. सवाल हिन्दू मुलसमान से ऊपर का है, जंग जहाँ भी है उसे हटाना होगा।

Monday, July 10, 2017

कौन है, कौन है वहां?


कौन है, कौन है वहां? दरवाजे की तरफ भागती हूँ...कोई आहट महसूस होती है. वहां कोई नहीं है. वापस आकर लेट जाती हूँ. कोई आएगा तो कॉलबेल बजाएगा न? आजकल तो सब शोर करके आते हैं...वाट्स्प मैसेज और फेसबुक अपडेट तक. यूँ आहट से पहचाना जाए ऐसा कौन है भला...पता नहीं. शायद वहमी हो गयी हूँ इन दिनों.

कानों में हर वक़्त कोई आहट गिरती रहती है. लगता है कोई आएगा. कोई आएगा यह सोचकर पहले कितने काम बढ़ जाते थे. रसोई में डब्बे तलाशना, बडबडाना ‘ओह...फिर कुछ नहीं बचा खाने को...कितना भी एडवांस में लाकर रखो ऐन वक़्त पर चीज़ें ख़त्म हो जाती हैं. फिर अचानक रसोई में सफाई की कमी नजर आने लगती है. कितनी भी सफाई करो कम ही लगती थी.’

‘बेडरूम कितना गन्दा है. बच्चों ने सब फैलाकर रखा है. दिन भर बटोरो दिन भर फैला रहता है. ड्राइंगरूम कितना उदास और अनमना सा है...ताजे फूलों ने कब का दम तोड़ दिया है और बासीपन का लिबास ओढकर सो चुके हैं. अख़बार पढ़े कम जाते हैं फैलते ज्यादा हैं. जिधर जाओ, उधर काम, एक प्याला चाय पीने की इच्छा को घन्टों की सफाई के अभियान से गुजरना पड़ता था.’

अब यह सब हंगामा नहीं होता क्योंकि ड्राइंगरूम अब रहा ही नहीं लेकिन आहटें खूब सुनाई देती हैं इन दिनों...कभी कभी लगता है असल में ये आहटें मेरे भीतर का कोई इंतजार है. किसका पता नहीं. लेकिन इंतजार तो है.

असल में कोई आये न आये मैं बचपन से पूरे घर को ड्राइंगरूम बना देना चाहती हूँ. उन्हू...ड्राइंगरूम नहीं बालकनी बना देना चाहती हूँ पूरे घर को...देखो न इसी चक्कर में बालकनी के गमले अक्सर कमरे में आते जाते रहते हैं...

सच कहूं मुझे ये ड्राइंगरूम वाला कांसेप्ट ही नहीं जंचता. वो मुझे एक नकली कमरा लगता है. जहाँ सब कुछ सजा होना चाहिए. नकली तरह से सजा हुआ. इन्सान भी. जो आये वो ड्राइंगरूम में बैठने के लिए तैयार होकर आये, मेजबान भी कपडे ढंग के पहन के सामने आये, सलीके से हाथ मिलाये या नमस्ते करे. दीवार पे टंगी महंगी पेंटिग अकड़ के कॉलर ऊंचा करके इंतजार करे कि आगन्तुक ज़रूर पूछें ‘ बड़ी अच्छी है, पेंटिंग किसकी है?’ कोई विदेशी नाम जानकर जिसे शायद आगन्तुक ने पहली बार सुना हो अचकचा कर ‘अच्छा-अच्छा’ कहते हुए संकोच में धंस जाए.

फिर वो महंगा वॉश, कालीन, सोफे...परदे...शो ऑफ में ऐंठते हुए दुनिया भर के देशों से बटोरकर लाये गये शो पीस. फिर महंगी क्रॉकरी में आया चाय नाश्ता...चमकते हुए गिलास में आया पानी जिसे देख इस डर के कि कहीं गिरकर टूट न जाए, प्यास ही मर जाए

जब मैं छोटी थी तो घर में ड्राइंगरूम नहीं था. एक ही कमरा था और कभी भी कोई भी आ सकता था. तो हर वक़्त कमरे को टाईडी रखने का दबाव रहता था और हर वक़्त खुद को भी ड्राइंगरूम मोड में रखना पड़ता था. फिर हमारी जिन्दगी में भी ड्राइंगरूम आ गया और साथ में और भी न जाने क्या-क्या आ गया. हालाँकि टाईडी रखने वाले दबाव से पीछा अब खुद ही छुड़ा चुकी हूँ. सोचती हूँ जिन दिनों ड्राइंगरूम नहीं थे उन दिनों में कितना कुछ था....बचपन की सारी मीठी स्मृतियाँ उसी एक कमरे वाले घर की हैं...धीरे धीरे घर के साथ हम भी बड़े होते गए. वैसे उन बिना ड्राइंगरूम वाले दिनों में ये आहटें कम होती थीं जो आजकल बढ़ गयी हैं.

आजकल जो लोग घर में आते हैं उनकी कोई आहट नहीं आती और जिनकी आहटें कानों में गिरती हैं उनका दूर दूर तक कोई अता-पता नहीं है.

फ़िलहाल, इन दिनों घर में कमरे कितने ही हों, ड्राइंगरूम कोई नहीं है...सब बालकनी हैं...हर कमरे में बारिश है...हर कमरे में चिड़िया आती है...सोचा था ड्राइंगरूम मोड के लोगों का न जीवन में कोई काम, न घर में. घर वही आएगा जो, घर आएगा यानी घर चाहे उखड़ा हो या बिखरा हो. चाहे चाय खुद बनाने के लिए भगोना भी खुद ही धोना पड़े आने वाले को. जिससे मैं मुस्कुराकर कह सकूँ ‘क्या खिलाने वाले/वाली हो आज?’ जो कुकर में हाथ डालकर मजे से चप चप करके सब्जी चाटकर खाए और पानी के लिए गिलास का मुह भी न देखे. जो बिखरे हुए को और बिखरा दे और ज़मीन पर पसरकर सो जाए कहीं भी...ड्राइंगरूम की ऐसी की तैसी जिसने जिन्दगी में भी कर रखी हो...कि स्लीपर्स में ही कोलम्ब्स बना फिरता हो...

तो घर तो ऐसा ही बना लिया है अब कि कॉलबेल भी बेमानी ही है...सीधे धड़धडाते हुए आने वाले दोस्तों का अड्डा. लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि ये रात-बिरात ‘कोई है’ की आहट किसकी होती है...क्या ये मेरा कोई डर है?

अभी-अभी पेपरवाले ने कॉलबेल बजाई है...महीने भर की पढ़ी-अनपढ़ी खूनी ख़बरों का बिल उसके हाथ में है...मेरे भीतर कड़क चाय पीने की इच्छा है...मुझे हिसाब करना पसंद नहीं...पांच सौ का नोट उसे पकड़ा देती हूँ, वो जितने वापस देता है फ्रिज पर रख दिए हैं बिना गिने हुए...

मेरा ध्यान चाय पर है...बाहर बारिश है...भीगने की इच्छा ज्वर के स्नेह के आगे नतमस्तक है...खिड़की से बारिश दिख रही है...सड़क दिख रही है...मिर्च के पौधे में लटकी मिर्चें इतनी प्यारी लग रही हैं मानो उनकी तासीर कडवे की है यह झूठ है...

घर में पसरा यह सन्नाटा, एकांत, ज्वर, चाय कितना जाना पहचाना सा है सब...फिर से कोई आहट सुनाई दी है मुझे...आपको भी सुनाई दी क्या? 


Friday, July 7, 2017

अवसाद में कौन नहीं है...



अजीब सी उधेड़बुन चल रही है. चलती ही जा रही है. उधेड़बुन यही कि अवसाद में कौन नहीं है... कहाँ नहीं है अवसाद? क्या अकेलेपन का अवसाद से कोई रिश्ता होता है. अकेलापन आखिर होता क्या है. यह जानते हुए कि सामने वाला अवसाद में है या हो सकता है क्या सचमुच हम उसकी मदद करने की योग्यता रखते हैं. मदद होती क्या है. कैसी होती है वो.

अकेलापन बाहर की चीज़ है या भीतर की? लगती तो भीतर की है लेकिन देखी बाहर जाती है. 'उसका इस दुनिया में कोई नहीं था/थी. वो बेहद अकेला था/थी.' अगर ऐसा है तो जिनके आसपास बहुत  हैं वो तो कतई अकेले नहीं हैं और न ही वो कभी अवसाद में जाएंगे। लेकिन बहुत सारे लोगों को देखा है अवसाद में धंसे हुए जिनके आसपास बाकयदा मज़मा लगा होता था. और ऐसे लोगों को भी बेहद खुशमिज़ाज़ और जिंदगी से भरा हुआ पाया जिन्होंने खुद को दुनियादारी से दूर रखा और अपने होने के उत्सव में किसी को भी शामिल करने से इंकार किया.

कभी-कभी आसपास देखती हूँ तो पाती हूँ कि अवसाद में कौन नहीं है भला. कोई कम,कोई ज्यादा। जो जितना संवेदनशील वो उतना ही अवसाद में. अवसाद में धंसे व्यक्ति की मदद कैसे की जा सकती है भला, उससे बात करके? क्या बात करके? किस वक़्त बात करके? कितनी और कैसी बात करके?

कई बार अवसाद में मदद को आगे बढे लोग अनजाने ही, उदासी और अवसाद को और भी ज्यादा बढ़ा देते हैं. उन्हें लगता है वो मदद कर रहे हैं जबकि वो समस्या को बढ़ा रहे होते हैं. कितने कम लोग होंगे जो समस्या पर बात किये बगैर समस्या तक पहुँचने और उससे लड़ने की ताक़त बन सकते हैं. बहुत कम. जबकि मैं यह अच्छी तरह से जानती हूँ कि मुझे मेरे काले, गहरे, गाढ़े, मृत्यु के करीब तक ले गए अवसाद से मेरे दोस्तों ने ही निकाला है, डॉक्टरों का नंबर तो बहुत बाद में आया. मुझे वो सारे दोस्त याद हैं जिन्होंने थप्पड़ लगाए हैं, जिन्होंने सीने में भींचकर रात-रात भर पीठ सहलाई है और वो भी जिन्होंने कहकहों की वजहें जानबूझकर बनायीं, जिन्होंने बिना मुझे खबर लगने दिए मेरी जिंदगी के रास्ते बदले हैं.... इसके बावजूद कहती हूँ कि अवसाद में मदद करने की ताक़त और योग्यता  बहुत कम लोगों में होती है.

अवसाद में धंसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होता वो सिम्पैथी और लेक्चर दोनों से चिढ़ता है. इससे बचने के लिए वो खुद को समेटता है, अपने भीतर की हलचल को किसी से साझा नहीं करता। वो  हँसता है, मिलता जुलता है, पार्टी करता है, फेसबुक पर स्टेटस लगाता है और अंदर ही अंदर लड़ता रहता है.

तो जिन्हें अकेलापन बाहर की चीज़ लगता है, उन्हें गलत लगता है शायद। परिवारों के भीतर सबसे ज्यादा अकेलापन और अवसाद पल रहा है. और परिवार के लोग बहुत कम समझ पाते हैं कि घर का कोई सदस्य अवसाद में है. एक दोस्त ३ साल तक डिप्रेशन का बाक़ायदा इलाज कराता रहा, दवाइयां काउंसलिंग सब लेकिन परिवार में किसी को बता नहीं सका.

एक और बात लगती है कि अगर कोई मदद की हाथ बढ़ाये तो क्या ज़रूरी है आप मदद की स्थिति में हों? हो सकता है जिसकी तरफ मदद का हाथ बढ़ा हो वो खुद गहरे अवसाद में धंसा हो. हो सकता है वो खुद मदद की तलाश में हो...अवसाद में घिरा व्यक्ति दूसरे के अवसाद से बहुत जल्दी इफेक्टेड होता है. ऐसे में वो या तो अपना नुकसान कर रहा होता है या दूसरे की मदद न कर पाने के अपराधबोध से घिर जाता है.

तो आखिर क्या हो? क्यों यह समाज अवसाद के साथ डील कर पाने में लगातार असफल हो रहा है. यह बात व्यक्ति के तौर पर कम समूह के तौर पर ज्यादा सोचे जाने की जरूरत लगती है. जिस तरह शरीर से जुडी तमाम बीमारियों को लेकर हमारा व्यव्हार होता है वैसा मन की बीमारी को लेकर नहीं होता। या तो हम खुद उसे समझ नहीं पाते, दूसरे की बीमारी को सतही तरह से लेते हैं और मान लेते हैं कि ज्ञान पिलाने से लेक्चर के बूस्टर सुबह शाम लगा देने से बात बन जायेगी, या 'बेकूफ़ हो क्या इतनी चीज़ें तो हैं फिर काहे अवसाद में हो ' कहकर उसके  दुःख को, उसके अवसाद को छोटा, तुच्छ साबित करने में लग जाते हैं. हम शायद नहीं जानते कि अवसाद में धंसा व्यक्ति अपने दुःख से बहुत प्यार करता है, उसे यह कतई सहन नहीं होता कि कोई उसे मूर्ख और उसके अवसाद को फ़ालतू कहे.

और तो और यह समाज मनोवैज्ञानिक बीमारी, अवसाद या डिप्रेशन का इलाज कराने वाले को पागल न समझ ले इसका भी खतरा कम नहीं होता इसलिए इलाज कराने वाले किसी को बताना नहीं चाहते कि वो क्लिनिकल या सायकोलॉजिकल मेडिकेशन में हैं. जॉब में भी इसका उल्टा असर पड़ सकता है. निजी जिंदगी में भी, दोस्तों में भी... यानी एक समाज के तौर पर हम डिप्रेशन से लड़ने के लिए तैयार नहीं हो सके हैं न अपने और दूसरों के तो बिलकुल नहीं।

सब कुछ बेहद उलझा हुआ नज़र आता है. सारे लोग रोबोट जैसे लगते हैं. लोग ऊपर से हंस रहे हैं, चल रहे हैं, घूमने जा रहे हैं, सिनेमा देख रहे हैं, सेल्फी ले रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर टूट रहे हैं... यह टूटन सुनने की हमारी क्षमता नहीं है. क्षमता अगर है भी तो कुछ कर सकने की सामर्थ्य नहीं है...इन बीमारियों का इलाज करने योग्य डॉक्टर्स भी अभी बहुत नहीं हैं. सायकोलॉजिकल काउंसलिंग के नाम पर लेक्चर और क्लिनिकल ट्रीटमेंट के नाम पर नींद की गाढ़ी डोज़ के आगे कम ही बढ़ पाए हैं डॉक्टर्स। यह गंभीर बात है... इलाज कहाँ हैं पता नहीं... जो इलाज आप किसी अवसाद में धंसे व्यक्ति को सुझाने वाले हैं यकीन मानिये वो उनसे ज्यादा इलाज़ आपको बता सकता है... फिर क्या हो... पता नहीं..

कुछ गाली देने वाले, थप्पड़ लगाने  वाले, गोद में समेट लेने वाले दोस्त तो होने ही चाहिए खैर...

तुम्हारी बाइक और कैमरा तुम्हें याद करते हैं दोस्त...

5 जुलाई, 2017.

प्रिय दोस्त कमल,

कैसे हो ?

यह मेरी तुम्हें पहली चिठ्ठी है. अजीब बात है न वाट्सअप, फेसबुक और फोन के ज़माने में चिठ्ठी लिख रही हूँ. उम्मीद है ठीक से पहुँच गए होगे तुम. यहाँ बारिशें बहुत हो रही हैं. वहां का मौसम कैसा है? तुम्हारे जाते ही वहाँ का मौसम खिल गया होगा न? जानते हो तुम्हारे जाने के बाद सब अस्त-व्यस्त हो गया है. सब कहते हैं वक्त सब सहेजना जानता है. सच में जानता है क्या? अगर जानता है वक़्त सब सहेजना तो तुम्हारी साँसों को क्यों न सहेजा?

अच्छा एक बात सच सच बताओ, जाने से पहले तुमने अपनी तस्वीरों को जी भर के देखा था क्या? उनमें इस कदर जिन्दगी भरी थी, उसने तुम्हें रोका तो ज़रूर होगा. लेकिन तुम ठहरे हठी यायावर, मौसम कैसा भी हो, रास्ते कितने भी मुश्किल तुमने यात्रा पर निकलने की ठान ली तो ठान ली. कितनी बार कहा दोस्तों ने कि कभी किसी की सुन भी लिया करो...लेकिन अगर सुनी होती किसी की तो ‘आवारगी’ शब्द को इतनी बुलंदियों पर कैसे पहुँचाया होता भला, कैसे जिया होता तुमने.

सीधे रास्ते तुम्हें कब भाते थे, हमेशा आड़े-टेढ़े रास्तों ने तुम्हें लुभाया. जो भी हो लेकिन तुम्हें बताना चाहती हूँ कि जब उस रोज तुमने मेरी ट्रैवेल सिकनेस का मजाक उड़ाया था तो मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आया था, सच्ची.

तुम्हारा कभी कोई एक ठिकाना रहा कब? हमेशा से किसी आवारा हवा के झोंके से कभी इस शहर कभी उस शहर. एक पल में एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर. रास्ते तुम्हारे इंतजार में बाहें पसारे बैठे होते. तुम नए रास्तों को खोजने के धुनी ठहरे, सो तुमने इस बार एकदम नया रास्ता ढूंढ लिया. और मुसाफिर तुम पक्के थे सो कोई गलती नहीं की, एक बार निकल पड़े तो सफ़र पार...

लेकिन दोस्त, एक बात बताओ इस बार तुम अपनी बाइक, कैमरे सब छोड़ गए...?

ये दुनिया यूँ ही जीने लायक नहीं बन पा रही है. इन्सान इन्सान के खून का प्यासा हो रहा है. कुछ भीड़ के हाथों मारे जा रहे हैं कुछ अकेलेपन से टूट रहे हैं...चारों तरफ दोस्तों का हुजूम है फिर भी कितनी तन्हाई है सबके भीतर. तुम्हारे भीतर भी बह रही होगी कोई तन्हा सी नदी...जिसे अपने समन्दर की तलाश होगी.

तुम इस कदर जिन्दगी से भरे थे कि तुम चल दिए...कि तुम्हें डर था शायद कि कहीं जिन्दगी ठहरने को न कह दे...कहीं रुकना न पड़ जाए...बिना सफ़र के जीवन कैसा होगा यह सोचकर तुमने लम्बे सफ़र की तैयारी की होगी.

हम तुम्हारी तस्वीरों में तुम्हें देखा करेंगे. तुम्हारा कैमरा और बाइक हम सबसे ज्यादा तुम्हें याद करते हैं...

ख्याल रखना!
प्रतिभा




Wednesday, July 5, 2017

‘क’ से कमल जोशी:


ये तस्वीर आपके जन्मदिन पर लगाने के लिए चुराकर रखी थी कमल जी. आप इतना रुलाओगे सोचा न था...

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'क’ से कविता, के एक साल पूरा होने के अवसर पर ‘क’ से कटियार साहिबा ‘क’ से कमल जोशी की बधाई लेते हुए आपको ‘क’ से कैसा लग रहा है?!’
ऐसा ही चुलबुला सा संवाद था हमारे दरम्यान जब यह तस्वीर खींची जा रही थी। यह बातचीत सिर्फ खिंचवाई जा रही तस्वीर की खातिर थी, जानबूझकर। न उस रोज़ मंच मेरा था, न कमल जी का। तस्वीर गीता दी ले रही थीं,हम सब इस नाटकीय तस्वीरबाजी पर हंस रहे थे।

कार्यक्रम उम्मीद से ज्यादा अच्छा हुआ और उसके बाद फेसबुक पर तस्वीरों की बाढ़ आ गयी। यह तस्वीर मेरे पास सुरक्षित रही। उन्होंने पूछा भी, ‘प्रतिभा अपनी वो वाली तस्वीर क्यों नहीं लगाई तुमने?!’ मैं उनसे हंसकर कहती ‘धीरज रखो कमल जी, उसे खास मौके के लिए संभालकर रखा है’। मैंने सोचा था उनके जन्मदिन पर एक अच्छी सी पोस्ट के साथ यह तस्वीर लगाकर उन्हें सरप्राइज़ दूँगी। क्या पता था कि सारी तस्वीरें यादें बनकर रह जायेंगी और वो ख़ास मौका ऐसा होगा।

बाहर बादल बरस रहे हैं भीतर न जाने क्या-क्या भीग रहा है। हर मुलाकात, हर चुहल, छेड़छाड़...सब किसी रील सा चल रहा हो जैसे,

मैं उन्हें ज्यादा वक़्त से नहीं जानती थी।सच कहूँ तो उनकी तस्वीरों के पार उन्हें ‘क’ से कविता के ज़रिये ही जाना। वो शहर में होते तो हमारी बैठकों में उनका होना तय होता। कभी जताया नहीं उन्होंने लेकिन कई बार सिर्फ बैठक में शामिल होने के लिए भी आये कोटद्वार से. बेहद जिन्दादिल, खुशमिजाज़ और ऊर्जा से भरे हुए। उन्हें देखकर रश्क होता था। गलती से भी कोई उनके सामने उम्र की बात करे तो तुरंत टोकते थे, ‘मैं युवा हूँ, इन सफ़ेद बालों पर मत जाना’ ऐसा कहकर उनके चेहरे पर जो मुस्कान आती वो दिल जीत लेती। बाइक और कैमरे का साथ उनकी जिन्दगी था।मुस्कान, जिन्दादिली उनके जीने का तरीका। वो अक्सर कहते, ‘तुम मुझे कविता पढना सिखाओगी? मुझे ठीक से कविता का पाठ करना नहीं आता।’ मैं हंस देती यह कहकर कि ‘अच्छा तो पढ़ते हैं आप’।

‘क’ से कविता' देहरादून की जान थे वो। बैठकों की चिंता उन्हें रहती, उन्हें बेहतर करने के लिए वो लगातार सोचते रहते और एक आवाज पर हाज़िर रहते। मुझे याद है ‘क’ से कविता की सालाना बैठक के ठीक पहले हमने प्रेस कॉन्फेंस की थी। एक रात पहले मैंने उन्हें फोन किया कि ‘कमल जी, आप प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए अपने मीडिया के दोस्तों को बोल दीजियेगा’। उन्होंने कहा फ़िक्र न करो! बस मैंने फ़िक्र छोड़ दी। वो उस वक़्त पिथौरागढ़ में थे।

अगले दिन सुबह प्रेस क्लब में मैंने देखा वो सामने से चले आ रहे हैं। मैं चौंक गयी ‘अरे आप, आप तो पिथौरागढ़ में थे न?’ मैंने चौंकते हुए पूछा। उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘तो क्या हुआ, अब यहाँ हूँ।मुझे लगा मुझे यहाँ होना चाहिए तो आ गया बस’ इतनी सहजता, इतना लगाव!

सालाना बैठक में एक वक़्त आया जब देहरादून के सभी साथी मंच के नीचे थे और देहरादून के बाहर से आये सभी साथी मंच पर थे। नरेंद्र सिंह नेगी जी भी मंच पर थे, अरुण देव भी, मनीष गुप्ता भी, गोपी भी और उत्तराखण्ड की तमाम अलग-अलग जगहों से आये ‘क’ से कविता के साथी भी। लेकिन कमल जी मंच पर नहीं गए। बाद में उन्होंने मुझसे एकांत में चुपके से कहा ‘जानती हो, मैं मंच पर क्यों नहीं गया, क्योंकि मैं तो देहरादून की टीम का हूँ न?’ उनके प्रेम पर आँखें भर आई थीं उस रोज़।
उनसे हुआ यह लगाव परिवार तक में घुल चुका है। एक तरफ ‘क’ से कविता परिवार उदास है दूसरी ओर बेटी भी शाम से उदास से है, लंदन में बैठी माँ उदास हैं।लखनऊ में बैठी दोस्त ज्योति उदास है जो हाल में कोटद्वार में उनसे मिली थी, कोटद्वार में विमल भैया उदास हैं जिनके घर पर उनसे आखिरी मुलाकात उनके शहर कोटद्वार में 18 जून को हुई थी।

बादलों के बरसने के ठीक पहले वो भैया के घर आये थे। पूरा परिवार उनसे मिलकर खुश था और वो भी बुरांश का जूस पीकर खुश थे। बोले,‘अच्छा हुआ रूह आफजा नहीं है। मैं ऊब गया हूँ रूह आफजा पीकर’। कितने किस्से सुनाये उस रोज, कितनी बातें। शायद इतनी तसल्ली से बैठकर इतनी लम्बी बातचीत पहली बार हो रही थी।
अस्थमा रहता था उन्हें, उन्होंने बताया कि किस तरह उस ज़माने में वो अस्थमा से डील करते थे जब इन्हेलर्स नहीं आये थे। उन्हें इंजेक्शन लेना पड़ता था। उन्होंने बताया कि कभी-कभार जब यात्रा के दौरान उन्हें दिक्कत होती तो वो खुद इंजेक्शन लगा लेते थे। कई बार लोग उन्हें ड्रग एडेक्ट समझने की भूल कर देते थे। एक बार तो किसी रेलवे अधिकारी ने उन्हें बिठा लिया,जाने ही नहीं दिया। तब उन्होंने जैसे-तैसे इंजेक्शन लगाने के बाद जब तबियत थोड़ी सुधरने लगी तो उसे बताया कि देखो ये डाक्टर का प्रिस्क्रिप्शन, यह कोई नशा नहीं दवा है।फिर भी वो स्टेशन मास्टर उन्हें शक की नज़र से ही देखता रहा।

जब कमल जी को पता चला कि मुझे ट्रैवेल सिकनेस है और मैं देहरादून से कोटद्वार ट्रेन से आई हूँ तो उन्होंने खूब मजाक उड़ाया। फिर ट्रैवेल सिकनेस से जुड़े कुछ पुराने किस्से भी साझा किये कि किस तरह कुछ लड़कियां उनके साथ बस में चल तो पड़ीं लेकिन रास्ते भर उल्टियाँ करती रहीं और सारे यात्री परेशान हुए।

आज सोचती हूँ कि क्या कमल जी अपनी मुस्कुराहटों में कोई गम छुपा रहे थे। मस्तमौला दिखने वाले कमल जी भीतर से उदास थे क्या?! उन्होंने कोटद्वार में अपने घर में मुझे आमंत्रित भी किया था लेकिन वक़्त की कमी के चलते जाना टल गया। वो पिछले दिनों चिकनगुनिया के बाद होने वाले दर्द की शिकायत किया करते थे। बताते थे कि ‘इस दर्द ने तोड़कर रख दिया है कि मुझे अपने लिए पहली बार बेड लाना पड़ा,वरना मैं ज़मीन पर ही सोना पसंद करता हूँ’।

चलते वक़्त उन्होंने कहा, ‘जल्दी ही देहरादून आता हूँ तब मिलता हूँ तुमसे, तुम मुझे कविता का पाठ करना सिखाओगी?!’ कोटद्वार में ‘क’ से कविता शुरू करने की बात भी हुई। विमल भैया खुश थे कि कोटद्वार में उन्हें उनके जैसा कोई युवा दोस्त मिल गया है। उन्हें क्या पता था कि पहली मुलाकात आखिरी मुलाकात बन जायेगी।

‘क’ से कमल जी ये ‘कैसे’ सफ़र पर निकल गए आप...हम सब आपको याद बनते देखने को कतई तैयार नहीं थे...


Sunday, July 2, 2017

शहर सिसकते न हों कहीं...



जीवन ने जो बहुत सारी बातें सिखाई हैं उनमें से एक यह भी है कि जिस तरह व्यक्ति से मिलना व्यक्ति से मिलना नहीं होता, उसी तरह शहर में जाना शहर में होना नहीं होता. आप एक हाथ में टिकट और पीठ पर बैग लेकर किसी शहर में उतरेंगे और वो शहर आपके लिए अपने दरवाजे खोल देगा इसमें संदेह है. शहर पहले आपको टटोलता है. वो आपकी घुम्म्क्कड़ी की नब्ज़ की टोह लेता है. आपके कदम जब शहर की सडको पर रखे जा रहे होते हैं, तब आप नहीं जानते कि शहर की सड़कें आपके भीतर के कोलाहल को, शहर से दोस्ती करने की आपकी इच्छा को तलाश रहे होते हैं. शहर की हवाएं आपके जिस्म को नहीं छूतीं वो आपके भीतर टटोलती हैं वो आवेग जिसमें शहर के प्रति प्रेम है, शहर से इकसार हो जाने की इच्छा है, यात्रा के जोखिम उठाने का साहस है, जिसमें कोई हड़बड़ी नहीं है...

शहर अपने प्रेमियों की तरफ पूरी मोहब्बत से हाथ बढ़ाते हैं बाकी बचे लोग टूरिस्टों की भीड़ बनकर शहर की सड़कों को रौंदते हुए, शहर के मिजाज़ को लांघते हुए, शहर की आत्मा को चोटिल करते हुए सेल्फीस्टिक के सहारे मोबाईल कैमरों में कैद होते रहते हैं, सोशल मीडिया पर अपलोड होते रहते है. शहर गाड़ियों के कोलाहल, सामर्थ्य से ज्यादा पर्यटकों का बोझ वहन करते हुए और बेहिसाब फैलाये गए कचरे को उठाते-उठाते सिसक रहे होते हैं. शहरों की सिसकियां किसी को सुनाई नहीं देती. गाड़ियों के हॉर्न सुनाई देते हैं. भीड़ की लिस्ट में एक शहर और जुड़ जाता है लेकिन शहर की तासीर नहीं जुडती, मौसम नहीं जुड़ते. जाने वो लौटने के बाद अपने भीतर जरा भी परिमार्जन महसूस करते हैं या नहीं? जाने  यात्रा उनके भीतर की गांठों को खोल भी पायी या नहीं, जाने वो बादल का टुकड़ा जिसे लपककर कैमरे में कैद किया था वो आँखों की कोर से बरसा भी या नहीं? उनमें से किसी के पास कहाँ था वक्त जो शहर के सीने से लगकर शहर के किस्से सुनता. 

सिनेमा देखने, मॉल जाने, नए फैशन के कपडे पहनने, जन्मदिन पर केक काटने, न्यू ईयर पर जबरिया उल्लास का लिबास पहनने की तरह ही टिक मार्क वाली यात्राएँ भी जीवन में  शामिल होने लगी हैं. इसका नतीजा है शहरों की लगातार होती ऐसी-तैसी. एक तो यूँ ही पर्यटन स्थलों खासकर पहाड़ों पर विकास के नाम पर सीम्नेट और कंक्रीट का जंगल खूबसूरत हरे जंगलों को काटकर उगाया जा रहा है तिस पर ये नए किस्म का उपभोक्तावाद जो यात्रा को भी चपेट मे ले रहा है. हमारे शहर सिसक रहे हैं, कोई सुनता नहीं. खूबसूरत झील के किनारे कचरे का ढेर हो रहे हैं. किसी भी सुन्दर जगह से गुजरिये कचरे का ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, पौलिथिन, चिप्स के पैकेट, दारू की बोतलें दांत चियारे मिल जायेंगी. हमारे सभ्य होने का उपहास उड़ाते...

पिछले बरस इन दिनों मैं अपनी पहली और अब तक की इकलौती विदेश यात्रा पर थी. स्कॉटलैंड के खूबसूरत पहाड़ों को देखते हुए पहला ख्याल अपने उत्तराखंड के पहाड़ों का आया था कि कहीं से कम खूबसूरत तो नहीं हैं हमारे देश के पहाड़, यहाँ के मौसम बस कि हम उनका ख्याल रख पाने में बुरी तरह से चूक जाते हैं. हमने अपने खूबसूरत शहरों को रौंद कर रख दिया है. हमने फेसबुक पर अपडेट करने के लिए या दोस्तों पर रौब झाड़ने के लिए पर्यटन के नाम पर शहरों की ओर दौड़ लगाना तो सीख लिया, तस्वीरें खींचकर अपलोड करना तो सीख लिया लेकिन शहरों से पेश आने का सलीका नहीं सीखा. 

पिछले दिनों जब एक कार्यशाला के दौरान नैनीताल में थी एक बार फिर यही सब आँखों के सामने था. समूचा शहर गाड़ियों के जाम, लोगों के हुजूम और गंदगी के ढेर के बीच बिलख रहा था. एक तरफ ऊंची पहाड़ियों पर बादलों का खेल चल रहा था दूसरी तरफ नकली मुस्कुराहटों से बजबजाती तस्वीरों के उद्योग में बदल चुका एक पूरा हुजूम...नैनी झील के सीने में छुपे दर्द को सुनने की फुर्सत और फ़िक्र किसी के पास नहीं थी.

वो सुन नहीं पा रहे थे कि असल में शहर को आपके जाने का इंतजार था...बारिशों के पहाड़, समंदर, जंगल, खेत, सड़कें बेहद मोहक होते हैं...पहाड़ों पर बादलों का अप्रतिम खेल चलता है जिसमें सूरज की मनमर्जियां अलग ही रंग भरती हैं...शहर अपने मेहमानों से प्यार करते हैं लेकिन मेहमानों को भी सलीकेमंदी से  पेश आना तो सीखना होगा न? जिन शहरों की खूबसूरती से खिंचकर हम वहाँ जाते हैं उसे ही नष्ट करके चले आते हैं ये कहाँ का सलीका है, ये कैसी यात्रा है? 

Thursday, June 15, 2017

इतनी भी अकेली नहीं होतीं 'अकेली औरतें'


जिम्मेदारियों से घिरी दौड़ती-भागती
खुद गिरती, खुद ही उठती
खुद रोती और खुद अपने आंसू पोछकर मुस्कुराती
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं

उनके आसपास होती हैं
सहकर्मियों की कसी गयीं फब्तियां
मोहल्ले में होने वाली चर्चाओं में उनका जिक्र
बेवक्त, बेवजह पूछे जाने वाले बेहूदा सवाल
और हर वक्त मदद के बहाने
नजदीकी तलाशती निगाहें
अकेली औरतों को
कहाँ अकेला रहने देता है संसार

अकेली औरतों के गले में मंगलसूत्र की जगह
लोगों को लटका नजर आता है 'अवेलेबल' का बोर्ड
उनके आसपास बिछ रहा होता है
अश्लील बातों का जाल

वो लाइन में लगकर खा रही होती हैं धक्के
पंचर स्कूटर को घसीट रही होती हैं खड़ी दोपहर में
मदद को यूँ तो बिछा होता है एक साजिश का संसार
लेकिन वे अपनी खुद्दारी को करती हैं सलाम
और सीखती हैं एक नया सबक हर रोज
होती हैं थोड़ी सी और मजबूत
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं
अकेली औरतें पिच्च से थूक देती हैं
जमाने भर का कसैलापन
ताकि भीतर की मिठास बची रहे
वो बेफिक्र गुनगुनाती हैं
जीती हैं अपने अकेलेपन को
चाहे अकेलापन उनका चुनाव हो या न हो
वो खड़ी होती हैं जिन्दगी के सामने पूरी ताकत से
अकेलेपन का उत्सव मनाती हैं
उनका हँसना और खुश रहना
चुनौती लगता है समाज को
वो हर रोज़ खड़ी करता है नई मुश्किलें उनके लिए

विवाहितायें, विवाहित होने की गौरव गाथाएं
उन्हें सुनाते हुए इतराती हैं बार-बार
लेकिन अनायास उभर आई अपनी अकेलेपन की
पीड़ा छुपाने में नाकामयाब भी होती हैं
अकेली औरतें मुस्कुराकर देखती हैं
पित्रसत्तता की लम्बी उम्र की कामनाओं
में डूबी स्त्रियों के मासूम अहंकार को
अपने अकेलेपन को अपनी शामों को घोलते हुए
वो जीती हैं कुछ मुक्कमल लम्हे
सहेजती हैं अपना कीमती अकेलापन
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं...

Saturday, June 10, 2017

जन्मदिन मुबारक ज्योति !



भरी दोपहर में न अमिया चुराईं, न गुट्टे या सिकड़ी के खेल खेले, न रस्सी कूदे न साथ में पापड़ बड़ियाँ बनायीं... नोट्स जरूर लिए एक-दूसरे से, इम्तिहान में पास बैठने का फायदा उठाया एक दुसरे से पूछापाछी की, कैसेटों की अदला बदली की, सिनेमा हॉल के दौड़ लगायी, कभी घर में बताकर कभी बिन बताये, पॉकेटमनी के पैसों से हिसाब लगाकर सस्ते शो को तलाशते हुए देखीं तमाम फ़िल्में भी...हज़रतगंज की सड़कों पर अपने मन के कितने कोने खोले, कितने सवालों की गिरहें खोलीं।

बरसों में गिनने बैठूं तो उम्र कम पड़ जाएगी हमारी दोस्ती के साल कितने हुए यह गिनने में क्योंकि हमने लम्हों में बरसों को जिया है, कभी-कभी तो सदियों में भी जिया है. वक़्त का हर रंग हमने साथ देखा है, वक़्त की हर करवट के साक्षी बने हैं.

वो लैंडलाइन के ज़माने में घंटों फोन पर बात करने वाले दिन थे, जब फ़ोन का बिल आने पर हम घरवालों से मुंह चुराते फिराते थे...और कभी किसी को समझा ही नहीं पाये कि दिन भर कॉलेज में साथ रहने के बाद, घंटों फोन पर बात करने के बाद भी आखिर ऐसा क्या बचा रह जाता है कि हमारी टीवीएस चैम्प (मेरी नीली, तुम्हारी ग्रे) एक दूसरे के घर की तरफ भागती थीं...कभी-कभी हम एक दूसरे को क्रॉस भी कर जाते थे. तुम मेरे घर पहुँच जाती थीं और मैं तुम्हारे.

हम अपने भीतर के भटकावों में से निकलने के लिए शहर की सड़कों पर भटकने लगे...कितनी बारिशों ने हमें साथ में भिगोया, फिर धूप और हवा ने ब्लोअर बनकर सुखाया भी. सच कहूँ, मैंने हमेशा तुमसे सीखा ही. इस रिश्ते में मैंने ही हमेशा तुमसे लिया, बहुत कुछ.

सबसे बड़ा था वो भरोसा कि अगर तुमने कुछ कहा तो उस पर दोबारा सोचने की ज़रूरत लगी ही नहीं. हालाँकि पसंद के मामले से लेकर वैचारिक मामलों तक में हमारी दिशाएं हमेशा विपरीत रहीं। हाँ, पिछले कुछ बरसों में हमारे विचारों में कुछ साम्यता बनने सी लगी है फिर भी हमारे स्वभाव के कंट्रास्ट मुसलसल जारी हैं और हमारा उन कंट्रास्ट को जीने का ढंग अब भी वही है...

याद है अभी हाल ही में तुमने कहा था, 'हिसाब-किताब के मामले में तुम पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता...बेकूफ ही हो एकदम...' कितना हंसी थी उस रोज़.

हमें एक-दूसरे को कभी बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि मन का मौसम कैसा है...हमें कभी एक दूसरे को जताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि कितनी ज्यादा वैल्यू है एक-दूसरे की. कभी लम्बी खामोशी में भी पढ़ा तुमने मुझे और कभी खूब बक-बक में भी सुनी मेरी ख़ामोशी...

मुझे याद नहीं तुमने कभी मेरी तारीफ में या मेरे किसी काम (किसी लिखे पढ़े ) की तारीफ में कोई कसीदे कभी काढ़े हों, हमेशा कुछ जो कम था वो बताया....या तुम्हारा यह कहना कि 'कुछ मजा नहीं आया...' या बस 'उन्हू' कहना...कितना सार्थक है वो सब...

जिन्दगी के सबसे काले दिनों में तुम्हारा साथ रौशनी सा रहा, और जिन्दगी के उजले दिनों में काला टीका बनकर रहीं तुम. ‘अच्छा ज्यादा बनो मत’ तुम्हारा कहना हो या मेरा पूछना कि ‘कहीं मुझमें भी अहंकार तो नहीं आ गया, क्योंकि अहंकार न होने का भी अहंकार कितने धीमे से उतरता है नसों में पता नहीं चलता है’ और तब तुम कहती कि ‘जब आएगा तो सबसे पहले मैं ही बताऊंगी...चिंता मत करो...’ कितनी बड़ी आश्वस्ति है इसमें.

तुम 'हाँ 'कह देती हो तो लगता है कुछ ठीक हो ही जायेगा...तुम नहीं जानती कि तुम्हारा होना कितना मायने रखता है मेरी जिन्दगी में...मेरी शादी के वक़्त हर पल तुम्हें ही तलाशती मेरी नज़रें हों या तुम्हारी विदाई के वक़्त निशांत को गुस्से से घूरती नज़रें...सबमें तुम ही तो थीं...

शहर बदले, जिन्दगी बदली, जिन्दगी में नए रिश्ते शामिल हुए...नए हालात बने...कितने उतार, कितने चढ़ाव...लेकिन तुम्हारा साथ...हमेशा ताकत बनकर खड़ा रहा...
आज अपनी बेटियों की दोस्ती को देखती हूँ तो आँखें ख़ुशी से छलक पड़ती हैं...हमारे प्यार को, हमारी दोस्ती को हमारी बेटियों ने सुभीते से संभाला है...दीत्या का मुझे 'मौसी' कहना...पहली बार ‘मौसी’ शब्द को महसूस करना था...तुम कहती थीं वो तुम्हारे बिना किसी के साथ कहीं नहीं जाती और वो बिना झिझक मेरे साथ चल पड़ी थी...याद है बैंगलोर की वो शाम? और मैं कहती थी कि शिवी मेरे बिना किसी पास रुकती नहीं और फिर उसका तुम्हारे घर दो दिन मजे से रुकना, एक दिन और रुक जाने का इसरार करना।

शिवी जब यह कहती है कि अगर ज्योति मौसी का फोन है तो कोई बात नहीं वरना किसी से बात करना अलाउड नहीं है तो कितना सुख होता है. जानती हो, घर आने के बाद जो बेटू का वक़्त होता है न, उसमें सिर्फ नानी और ज्योति मौसी से ही बात करने की परमीशन है मुझे...

जब ज़माने के तमाम रिश्तों की कलई उतर रही हो, तमाम लोग हालात के चलते बदल गए हों एक हमारा रिश्ता ही है जिसकी चमक लगातार बढती जा रही है...

सच जिन्दगी में एक ऐसा दोस्त कितना कीमती होता है जिसके आगे कुछ भी कभी भी कैसे भी कहा जा सके जिसकी सहमती ज़रूरी न हो जिसे कैसा लगेगा यह सुनकर का डर न हो...आज तुम्हारे जन्मदिन पर इससे बेहतर तोहफा मुझे नज़र ही नहीं आता...इन बच्चियों में अपने दोस्ती को रूपांतरित होते देखना....इससे बेहतर क्या होगा...

जानती हूँ तुमको इस तरह कहा जाना पसंद नहीं है फिर भी मैंने कब तुम्हारी हर बात मानी है....नाराज़ न होना, हो भी गयी तो क्या जरा डांट ही लोगी न, एक बार और सही...

जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...हमें साथ साथ बूढा होना है...बच्चों से बहुत सारी डांट खानी है और बहुत सारा साथ में जीना है...लड़ना है...बढ़ना है....जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...बहुत से बहुत ज्यादा प्यार....

Friday, June 2, 2017

यह कोई हीरा नहीं

न न मत मांगो
यह कोई हीरा नहीं
तुम्हारे बाज़ार में
कोई कीमत नहीं इसकी
मेरा गम है ये
मेरी तन्हाई है
मैं अपने गम से जिंदा हूँ...

Thursday, June 1, 2017

आई एम नॉट अ गुड गर्ल....ओके?


अठारह बरस पहले जब शादी के वक़्त विदा हुई थी तो रो-रोकर धरती हिला दी थी...कई महीनों तक उदासी साथ लिए घूमती रही...हालाँकि माँ उसी शहर में थीं जिसमें मैं, यानी लखनऊ ही. फिर भी यह कहना या सुनना ही अजीब लगता था कि 'माँ के घर जा रही हूँ' या 'आई हुई हूँ...' क्योंकि शादी के पहले घर का एक ही अर्थ होता था...माँ का एक ही अर्थ होता था...

माँ से बिछुड़ना हमेशा विदाई की याद दिला देता है...'इत्ती बड़ी हो गयी हो अब भी रोती हो' अब बेटी कहती है...विदाई के वक़्त यही बात मुझसे दस बरस छोटे भाई ने कही थी...लगता है मैं कभी बड़ी नहीं होउंगी...कम से कम माँ को लेकर तो कभी नहीं...


माँ मजबूत हैं, वो रोती नहीं...रोने पर फटकारती हैं, गले नहीं लगातीं...वो मुझे मजबूत बनाना चाहती होंगी...लेकिन मैं रही रुतड ही...आज माँ को फिर से स्टेशन के लिए रवाना करते हुए एक हुडक कलेजे में उभरी जो कई दिनों से भीतर ही भीतर घुमड़ रही थी शायद...

माँ मेरे पास रह सकें इसलिए पापा ने अकेले रहना सीखा वो भी इस उम्र में...परिवार की यही ताकत है...दूर रहकर भी एक दूसरे के साथ खड़े रहने की ताकत. माँ आज लखनऊ गयी हैं पापा के पास...फिर लंदन जाएँगी भाई भाभी के पास....फिर लौट आएँगी मेरे पास....सब कुछ अच्छा है फिर भी माँ के बिना घर अच्छा नहीं लगता...

बिना डांट खाए दिन बीतेगा अब...ये भी कोई बात हुई....ओके ओके, कोई मत समझाओ...आई एम नॉट अ गुड गर्ल....लव यू माँ...

Thursday, May 4, 2017

मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे ...



ये इनायतें गजब की ये बला की मेहरबानी
मेरी खैरियत भी पूछी किसी और की जबानी...

मौसम सुबह से संगत बिठाने में लगा था, इंतजार था कि बस हथेलियों पर रखा था, कभी भी टूटने को तैयार...शाम वादे के मुताबिक अपने साथ लेकर आई थी शुजात खान साहब को...जो राग यमन छिड़ा तो दून की वादियों में कोई नशा तारी होने लगा...'तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे' के साथ ही उन्होंने देहरादून की खूबसूरत शाम चुरा ली और उसे पुरकशिश अंदाज़ में ढाल दिया...'ये इनायतें गजब की ये बला की मेहरबानी,' 'खुसरो दरिया प्रेम का,' 'पिया घर आये' ' छाप तिलक सब छीनी,'' मन कुन्तो,'' वैष्णव जन ते' से होते हुए शुजात साहब हमारी सुध बुध हमसे चुरा चुके थे...आखरी में' रंगी सारी गुलाबी चुनरिया...मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे ' सुनाकर वो देहरादून को अपना दीवाना बना चुके थे...

हम जैसे पहले से उनके दीवानों को उनसे मुलाकात की इक हसरत अभी बाकी थी. हालाँकि पता नहीं होता इन मुलाकातों का कि क्या बात करनी है, क्या कहना है, क्या पूछना बस कि साथ को महसूसना और क्या..अपनी भीगी सी सकुचाई आवाज़ में मैंने कहा, 'शिष्या हूँ सितार की...' बात पूरी होने से पहले वो कहते हैं 'मैं भी शिष्य हूँ सितार का...' चंद लम्हों की मुलाकात थी, मुक्कमल मुलाकात...लौटते वक़्त चाँद हंसकर बोला, 'अब तो खुश हो न?' मैं तबसे अब तक सिर्फ मुस्कुरा रही हूँ...मुसलसल...


Sunday, April 30, 2017

रात है..,चाँद है...इंतजारी है...



पुर नूर बशर कहिये या नूरे खुदा कहिये
अल्फाज़ नहीं मिलते सरकार को क्या कहिये...

दिन सूरज के सात घोड़ों पर सवार होकर उगते हैं इन दिनों. किसी छुट्टी का मुंह देखे जमाना बीता. एक दिन में न जाने कितने दिन उगते हैं कि न खुद का होश न किसी की खबर बस कि भागते जाना, पहुंचना कहीं नहीं...हमेशा की तरह. यूँ कहीं पहुँचने की कोई इच्छा भी नहीं.

किसी सुबह की मुठ्ठियों में कैद बूंदों को जबरन छीन लेती हूँ...चेहरे पर गिरी चंद बूंदों की नमी बीते न जाने कितने सूखे दिनों की आंच को मध्धम करने को काफी थी...मेरे मन के शहर को इस शहर से बेहतर कौन जानता है भला कि राह चलते शहर की हवायें पीठ के दर्द को सहला जाती हैं और गालों पर रखती हैं एक बोसा, बेचैन मन को धीरज धरने को कहती हैं.

धीरज कोई बहुत अच्छी चीज़ भी नहीं कि कब तक धरे कोई धीरज. अचानक एक दोस्त याद आता है जिसे धीरज कहकर चिढाया था कभी...फ़िलहाल..कोई धीरज नहीं है जीवन में...लेकिन मैं जीवन में हूँ, और जीवन मुझ में भी...पेड़ों की ओट से झांकता चाँद अपने खेल खेलने में माहिर है...वो मुझे भटका रहा है...मुझे भटकना भा रहा है...

इस भटकाव में शुजात खान साहब की आवाज़ साथ है...सितार वो बजा रहे हैं जिस्म में तरंगे दौड़ रही हैं मानो...सितार पर बजाये सारे राग याद आते हैं..उँगलियों में मिजराब पहने कितना समय बीत गया...रोज सितार को हसरत से देखती हूँ फिर कलाई में बंधी घडी की भागती सुइयों को देखती हूँ...

घडी की सूइयों की मुताबिक मैं भागती हूँ...सितार भीतर बजता है, शुजात खान साहब का इंतजार भी बजता है..वो दादरा सुनने की ख्वाहिश बढती जाती है जिसे पहली बार सुना था उनकी आवाज में...'रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे...मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे...' कोशिश भी की थी सितार पर बजाने की लेकिन वो कोशिश ही थी...कच्ची कोशिश जिसके नाकाम होने में भी सुख रहा..इश्क में नाकाम होकर आप इश्क को बचा लेते हैं ठीक उसी तरह जैसे ज़िन्दगी में नाकाम होकर आप जिन्दगी बचा लेते हैं, मैंने बचा ली है इस दादरा के साथ अपने दिल की लगी भी...

फ़िलहाल...रात है..,चाँद है...शुजात खान साहब की इंतजारी है...

Friday, April 28, 2017

प्यार ही मेरा धर्म है, तुम ही उसके रीति रिवाज़



इंग्लैण्ड के प्यारे रूमानी कवि जॉन कीट्स (1795-1821) ने बहुत छोटी सी ज़िन्दगी जी. लेकिन उस छोटी सी जिंदगी के रंग इतने गाढ़े थे कि उनकी चमक उन रंगों की महक आज तक फ़िज़ाओं में मौजूद है. 23 बरस की उम्र में कीट्स  को पड़ोस में रहने वाली फैनी ब्राऊन से प्यार हो गया. लेकिन ज़िन्दगी कीट्स के हिस्से में इतनी कम आई थी कि प्यार बस प्यार ही रहा, किसी रिश्ते के अंजाम तक नहीं पहुँच सका. ट्यूबरकोलोसिस ने कीट्स की जान ले ली लेकिन उनका प्यार अब भी कायम है... उनकी कविताओं में, उनके खतों में, कुछ इस ख़त में भी...

प्रिय फैनी,

तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. तुम्हें पता है, मैं सब कुछ भूल जाता हूँ सिवाय तुम्हारे। तुम्हारे बिना ज़िन्दगी ठहरने लगती है, मैं तुम्हारे बिना कुछ भी सोच नहीं पाता। तुमने मुझे अपने भीतर समाहित कर लिया है.

मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे मैं तुम्हारे भीतर घुलता जा रहा हूँ. मैं यह सोचकर अचंभित होता हूँ कि किस तरह लोग धर्म के लिए अपनी जान दे देते हैं. यह सोचकर मेरे रोएं खड़े हो जाते हैं कि किस तरह लोग ऐसा कर पाते होंगे. फिर मैं सोचता हूँ कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ शायद लेकिन मेरा धर्म क्या है...

मेरा धर्म है प्यार, मैं प्यार के जान लिए दे सकता हूँ, मैं तुम्हारे लिए जान दे सकता हूँ. प्यार ही मेरा धर्म है और इस धर्म के सारे रीति रिवाज़ सिर्फ तुम हो.

तुम मुझे अपने प्यार की ताक़त से सबसे दूर चुराकर ले जा चुकी हो, जिसका विरोध मैं करना भी नहीं चाहता।

तुम्हारा
कीट्स


Sunday, April 2, 2017

दुःख को विदा



एक स्त्री दुःख को विदा करने जाती है
और देखती रहती है उसे
देर तक दरवाजे पर खड़ी

दुःख भी जाता नहीं एकदम से
ठिठका रहता है ड्योढ़ी पर
ताकता रहता है उसका मुंह
कि शायद रोक ले...

धीरे-धीरे वो अपनी हथेली
उसकी हथेलियों से छुड़ा लेती है
दुःख सर झुकाए देर तक
बैठा रहता है दरवाजे पर

स्त्री के गालों पर बहती नमी
टिमटिमा उठती है
चांद की रौशनी में

इतने बरस के साथी
उदास
डूबे हुए आकंठ स्मृतियों में

भीतर रखा फोन घनघनाता है
वो भारी क़दमों से कमरे में लौटती है
दुःख का हाथ छुड़ाकर
दुःख से कहती है ‘विदा...’

उठाती है फोन
खिल उठता है उसका चेहरा
फोन के स्क्रीन पर 'प्रेम' चमक रहा है
‘मैं जानती थी तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगे’
वो भावुक होकर कहती है

दरवाजे से वापस आकर मुस्कुराता है दुःख...

Thursday, March 30, 2017

हर दस्तक को गौर से सुनना...


दरवाजे पर पड़ती हर दस्तक बताती है
दस्तक देने वाले के भीतर की दुनिया का पता

हौले से दरवाजे पर कोई रखता है हाथ
होते-होते रह जाती है कोई दस्तक अक्सर
दस्तक देने वाले को पता होता है
कि दस्तक हुई नहीं
फिर भी
वो बेआवाज़ दस्तक को सुन लिए जाने के इंतजार में रहता है
पुकार से पहले सुन लिए जाने के सुख के इंतजार में

हथेलियों को आपस में रगड़कर
दरवाजे के खुलने का इंतजार करता आगंतुक
दोबारा दस्तक देने को हाथ बढ़ाता है

दोबारा दरवाजे पर हाथ ज[रखनेसे ठीक पहले रुक जाता है
यह सोचकर कि कहीं सोया न हो दरवाजे के उस पार का संसार

कहीं कोई झगड़े के बाद के अबोले में न हो
कहीं ऐसा न हो कि नींद के बाद का मीठा आलस घेरे हो उसे
कहीं दरवाजे की थाप से मीठा आलस बिखर न जाए

चुपचाप बिना दस्तक दिए वापस लौटने से पहले
दरवाजे को उदास नज़रों से देखता है
इस उदासी में एक राहत भी है
कितनी हिम्मत जुटानी होती है यूँ दरवाजों पे दस्तक देने को

कभी कोई बेधडक दस्तक भी सुनाई दे सकती है दरवाजे पर
जोर-जोर से, दरवाजे पर पड़ती दस्तकें
साधिकार, साभिमान दस्तकें
उनमें हड़बड़ी होती है अंदर आने की
सिर्फ दीवारों और छत के भीतर आने की,

कभी उदास दस्तकें भी सुनना
दरवाजे भीग जाते हैं इन दस्तकों से
ये दरवाजों पर हौले-हौले गिरती हैं
गिरती रहती हैं
मनुहार होती है इन दस्तकों में
बिना मांगी माफियाँ होती हैं
बहुत उदास होती हैं ये दस्तकें

बहुत रूमानी होती हैं कुछ दस्तकें
बस एक बार 'ठक' से बजती हैं दरवाजे पर
उन्हहू दरवाजे पर नहीं, सीधे दिल पर
दरवाजे के उस पार असंख्य फूल खिल उठते हैं
पर दरवाजा खुलता नहीं
दरवाजे के इस पार मिलन के न जाने के कितने पुल बनने लगते हैं
लेकिन दरवाजे पर दस्तक दोबारा नहीं उभरती
दरवाजे के इस पार से उस पार की दुनिया महकने लगती है
दरवाजा खुलता नहीं
मन खिलते रहते हैं
अभिमानिनी दरवाजा 'एक और' दस्तक का इंतजार करता है
अभिमानिनी आगंतुक बिना दोबारा दस्तक दिए
दरवाजे के खुलने का इंतजार करता है
दोनों तरफ एक हलचल भरा मौन उभरता है,
दरवाजा खुलता नहीं
आगंतुक लौट जाने से पहले
दोबारा दस्तक देने को हाथ उठाता है
दस्तक से ठीक पहले खुलता है कोई दरवाजा...
खुलती है कोई दुनिया भी

दरवाजे पे उभरी दस्तकों में कई बार दर्ज होता है 'भय'
हर एक दस्तक दिल में हजार संदेह पैदा करती है
ये दस्तकें असल में
खोले जाने का अनुरोध नहीं हैं, खुली धमकी हैं
दस्तकों का एक पूरा संसार है
हर दस्तक में कुछ चेहरे पैबस्त होते हैं
कुछ एहसास भी
लेकिन बहुत ज़रूरी है उन दस्तकों को सुना जाना जो
रह गयीं दस्तक बनते-बनते
किसी चेहरे में किसी एहसास में ढलते-ढलते
कभी दरवाजों से ज़रूर पूछना
उन अजनबी आहटों का हाल
जो बेआवाज़ लौट गयीं।


Monday, March 27, 2017

एक चम्मच प्यार


प्रेम
उसे मालूम था कि
वो स्त्री है दुनिया की सबसे मजबूत स्त्री
जो है उसके प्रेम में
इसलिए उसने
सारे निर्मम प्रहार किये उस पर ही

एक चम्मच प्यार
क्या फर्क पड़ता है जिन्दगी में
अगर कम हो जाए 
एक चम्मच प्यार
सिवाय इसके कि जिन्दगी
‘जिन्दगी’ नहीं रहती...


विसर्जन 
राख सिर्फ फुंके हुए जिस्म की ही
नहीं बहाई जाती नदियों में

फुंके हुए अरमानों की राख
आंसुओं की खारी नदी में
बहाई जाती है जिन्दगी भर...


Tuesday, March 21, 2017

जीने से भी ज्यादा जियूँगी


सफर फिर पांव में बंधा है. साथ बंधा है अकेलापन भी. सफर से पहले कितना कुछ समेटना होता है. सफर पूरा होने पर कितना कुछ होता है करने को. लेकिन सफर के ठीक बीच में राहत के सिवा कुछ भी नहीं. लोगों का रेला है, रेल है खुद से मेल है. हरी सुरंग के बीच से गुजरते हुए, पहाड़ों पे हाल में गिरी बर्फ की तासीर हथेलियों पे लिए रेगिस्तान की तरफ का रुख किया है. रुख किया है असल में अपनी ओर. न जाने कितना सूखा भर गया है पिछले दिनों. बारिशों की लड़ियों से खेलते हुए भी, चितचोर चैत से लाड़ लड़ाते हुए भी, शायद खुद से लड़ते-लड़ते थकने लगी हूँ. जिंदगी से लड़ते-लड़ते ऊबने लगी हूँ. 

खैर, सफर है, आराम है...साथ कोई नहीं. इसका भी सुख है. कभी-कभी किसी का न होना भी कितना ज़रूरी होता है. वैसे कोई कभी भी कहाँ होता है, होने के तमाम वहम ही तो होते हैं.

सफर मोहक है हमेशा की तरह. खाना है, भूख नहीं, पानी है प्यास नहीं. बर्थ है नींद नहीं। बस छूटते हुए रास्तों को देखने का सुख है. जिंदगी जीने की तलब है. यूँ हारना अच्छा नहीं लगता, थकना अच्छा नहीं लगता. तरकीबें भिड़ाती रहती हूँ. धूमिल की कवितायेँ साथ हैं... दिन के बीतने और रात के करीब आने के बीच हथेलियों में इंद्रधनुष खुलता है. नागेश कुकनूर की फिल्म 'धनक.' कबसे लिये फिर रही हूँ, लेकिन देखने की फुर्सत और इच्छा दोनों का मेल होने के इंतज़ार में हूँ. फिल्म खत्म हो चुकी है... बस इतना कह सकती हूँ कि एक बार फिर नागेश से प्यार हो गया है. पूरी फिल्म सुख में डुबो चुकी है. मैं फ़िल्में देखते हुए खूब रोती हूँ. धनक पूरे वक़्त आँखें भिगोये रखती है. सुख का रुदन, जिंदगी में डूबने का सुख...

नागेश के लिए मन में शृद्धा जागती है. कितनी बारीक नज़र है और कितना सादा सा संवेदनशील दिल. पिछले किसी सफर में नागेश की ही 'लक्ष्मी' देखी थी आज तक सिहरन महसूस होती है और आज ये धनक....मीठी सी मासूम सी फिल्म. शाहरुख़ तुम पर कभी दिल-विल आया नहीं मेरा लेकिन धनक में तुम नहीं होकर भी दिल चुरा ले गए...

हाँ नागेश, जीने से भी ज्यादा जियूँगी मैं, उड़ानों से भी आगे उडूँगी...पक्का प्रॉमिस...

( सफर, इश्क़ शहर से गुलाबी शहर )

Friday, March 17, 2017

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर...


आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो...

- जां निसार अख्तर

Wednesday, March 15, 2017

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र


ढेर सारे भ्रष्टों में किसी एक भ्रष्ट का चुनाव है लोकतंत्र
संविधान नाम की किताब का एक पन्ना है लोकतंत्र

बदलाव का एक सुपरहिट नारा है लोकतंत्र
बेईमान, हत्यारों, बलात्कारियों के आगे हारा है लोकतंत्र

सच्चाई और ईमानदारी की जमानत ज़ब्ती का ऐलान है लोकतंत्र
भीड़ को हांकने का साधा हुआ हुनर है लोकतंत्र

हुल्लड़बाज़ी और हंगामा है लोकतंत्र
जनता का फटा हुआ पाजामा है लोकतंत्र

छुटभैये नेताओं की सहालग है लोकतंत्र
मीडिया के पेट का राशन है लोकतंत्र

सुना तुमने? कहते हैं ईवीएम की कोई कारस्तानी है लोकतंत्र?
वैसे दिमागों को बरगलाने की शैतानी तो है ही लोकतंत्र

उंगली पर लगा एक गाढ़ा नीला निशान है लोकतंत्र
हालात के बद से बदतर होने जाने का प्रमाण है लोकतंत्र

इरोम की हार का शोकगीत है लोकतन्त्र
हत्यारे के चेहरे की कुटिल मुस्कान है लोकतंत्र।

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र
अब तो बस एक बदरंग तस्वीर है लोकतंत्र

वोटर को उंगलियों  पर नचाने का खेल है लोकतंत्र
झूठ की चाशनी चटाने का नाम है लोकतंत्र

सुनो, सम्भल के इसे छूना, इसकी है बडी तेज़ धार
देश ही नहीं रिश्तों पर भी इसने किया है खूब प्रहार।

(अगड़म बगड़म )


Thursday, March 9, 2017

क्यों है एग्जाम का हौव्वा?



इम्तिहान...एग्जाम...परीक्षाएं...सर पर सवार हैं...किसके? विद्यार्थियों के तो नहीं. फिर किसके सर पर सवार हैं? माँ बाप के, टीचर्स के, स्कूलों के, नौकरी देने वालों के? किसके सर पर सवार हैं ये जबकि चिंता तो सबको है कि बच्चे परेशान न हों, समाज बेहतर बने, शिक्षा का मकसद सिर्फ रोजगार की ललक में इकठ्ठा की गयी डिग्री न हो. तो फिर झोल कहाँ हैं? क्यों हमारे बच्चे मार्च आते ही डरने लगते हैं और जून आते ही खुश हो जाते हैं... यह सवाल बराबर खाए जाता है. जैसे और दूसरे तमाम सवाल खाए जाते हैं.

मैं जिस तरह सोचती हूँ उस तरह जीने का प्रयास करते हुए उसे महसूस करने का प्रयास भी करती हूँ. उस महसूसने के आधार पर सोचने को बदला भी है कई बार. कि सोचने और बात करने और जीने के बीच अगर कोई डिस्कनेक्ट है तो कुछ तो गड़बड़ है. तो ऐसा ही मैंने परीक्षा शब्द के साथ करने की कोशिश की. मेरे भीतर जो डर, जो भय 'परीक्षा' शब्द को लेकर बोये जा चुके थे उनका मैं कुछ नहीं कर सकी लेकिन यह प्रयास ज़रुर किया कि यह डर किसी और को न दूं. मैंने अपनी बेटी को कभी भी इस शब्द के घेरे में फंसने नहीं दिया.

जब क्लास के सारे बच्चे, बच्चों के पैरेंट्स घबराये होते थे हैं और मेरी बेटी मजे से खेल रहे होते हैं. एग्जाम को मुंह चिढाना उसे आता है. कल पेपर है इसलिए खेलना और टीवी देखना कभी बंद नहीं हुआ. न ही सोने से पहले हमारा गप्प मारने का सिलसिला. मुझे याद नहीं मैंने कभी भी उसे कहा हो पढाई करने को. बस यह कहा कि 'मजा न आये तो मत पढना, और मजा आने में अगर कोई दिक्कत आये तो ज़रूर बताना.' यह सिलसिला जारी है.

लेकिन समाज घर में सीखे हुए को चुनौती देने को तैयार रहता है. आज वो आठवी क्लास का इम्तिहान देने गयी है वैसे ही जैसे रोज जाती है, न कोई टीका, न दही चीनी न स्पेशल वाला गुड लक कि दिन अच्छा बीते और खूब मजे करो स्कूल में इस कामना के साथ रोज भेजती हूँ आज भी भेजा. लेकिन सवाल इतना भर नहीं है.

अब कुछ सवाल उसके भी हैं. मैंने उसे एग्जाम से डरना नहीं सिखाया लेकिन समाज एग्जाम नाम का डंडा लेकर पीछे पड़ा हुआ है. एक हौव्वा बना है चारों तरफ. बच्चे परेशान हैं, टीचर्स डरा रहे हैं, नाइंथ में आओ तब पता चलेगा...एग्जाम अब उसके अपने क्लास में नहीं होते. अलग से बड़े हाल में होते हैं. साथ में बैठे दोस्त अनजाने चेहरे बन जाते हैं, एग्जाम के दौरान आसपास अपने जाने पहचाने टीचर्स की जगह अनजान खडूस चेहरे टहलते हैं.

मेरा उसे बचपन से यह समझाना कि 'एग्जाम कुछ नहीं होता यह भी रोज के जैसा एक दिन है जिसे एन्जाय करो' धराशाई होने लगता है. वो पूरी हिम्मत से, लगन से मेरी सीख को बचाने की कोशिश करती है लेकिन कभी कभी हारने लगती है. तब मुझसे लडती है, सवाल करती है, 'क्यों इतना इम्तिहान का हौव्वा बना रखा है सब लोगों ने. जो आपने हमें सिखाया है वही तो पूछना चाहते हैं न? कोई नया पूछने में तो दिलचस्पी है नहीं किसी की? तो पूछ लो न आराम से, इतना डराते क्यों हो?' पेपर में सब आता होता है फिर भी काफी देर तो इस 'खतरनाक' माहौल से एडजस्ट करने में लग जाता है. वो उदास हो जाती है. कहती है 'मम्मा मुझे एग्जाम से डर नहीं लगता लेकिन ये एग्क्साम टाइम स्कूल जाने में मजा नहीं आता. '

एक रोज उसने बताया उसके क्लास एक बच्चा एग्जाम हॉल में बेहोश हो गया. वो डर के मारे बेहोश हो गया था. बहुत सारे बच्चों के पेट में दर्द होने लगता है, चक्कर आना, उलझन, घबराहट होना सामान्य बात है. बेटी कहती है, मेरे सारे दोस्त इतने परेशान होते हैं एग्जाम टाइम में कि मुझे भी बुरा लगने लगता है. क्या एग्जाम शब्द का यह हौव्वा दूर नहीं कर सकते आप लोग? मेरी बोलती बंद हो जाती है.

मुझे उन पैरेट्स के चेहरे आते हैं जो बच्चों के कम नम्बर आने पर बुझ जाते हैं और बहुत अच्छे नम्बर लाने के लिए टीचर्स से कहते हैं 'आप मारिये इसे जितना चाहे लेकिन नम्बर कम नहीं आने चाहिये.' जिनके लिए बच्चे का रिपोर्ट कार्ड उनका स्टेट्स सिम्बल है. वो पैरेंट्स भी याद आते हैं जिन्हें बच्चों को स्कूल भेजने का मतलब अच्छे नम्बर से पास होकर ही पता है.

इस अच्छे नम्बर के संसार पर बहुत सवाल हैं? रिपोर्ट कार्ड में अच्छे नम्बर जमा करने के चक्कर में जिन्दगी के रिपोर्ट कार्ड से नम्बर लगातार कम किये जा रहे हैं...यह तो ठीक नहीं है न? हमारे बच्चे परेशान हैं उन्हें इस नम्बर रेस से मुक्त तो करो.

Wednesday, March 8, 2017

सहिराना जादू और रंग अपने होने के...


'तुम्हारी हथेलियों में क्या है?' लड़की ने अपनी नजरें नई कोंपले वाले पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर टिकाते हुए पूछा.
लड़के ने मुस्कुरा कर कहा, 'रंग'
लड़की ने मुस्कुराकर कहा, 'दिखाओ...'
लड़के ने हथेलियां आगे कर दीं...सुर्ख लाल रंग से भरी हथेलियां।
'क्या ये रंग पक्का है?' लड़की ने पूछा
लड़के ने उसके गाल पर अपनी उंगली से लाल लकीर खींचते हुए कहा, 'एकदम पक्का.'
लड़की मुस्कुराई. सांझ ने अपनी चादर में उन दोनों को समेट लिया।

चैत दरवाजे पर था और फागुन अपनी पोटली बांध रहा था। एक मौसम के आने और दूसरे मौसम के आने के बीच का जो समय होता है जिसमें जिंदगी के राग रहते हैं उसी मौसम में जब स्त्रियां जिदंगी के पक्के रंग ढूंढ रही थीं रंग जो जेहन को नई तरबियत से नई समझ से रंगें, जो रूहे सुखन बनें।

जाते फागुन ने चैत की हथेलियों पर आम की बौर रखीं, गेंहूं की बालियां रखीं, सरसों की लहक रखी, मिट्टी की महक रखी, जिंदगी जीने की शिद्दत रखी, मुश्किलों से लड़ने का हौसला रखा और कान में हौले से कहा, 'इस धरती का कोना-कोना प्यार से रंग देना।'

चैत बस दो कदम की दूरी पर था, उसने अपनी हथेलियों में फागुन की दी सारी नियामतों को सहेजते हुए मुस्कुराकर कहा, 'फिक्र न करो दोस्त, मैं ऐसा ही करूंगा' और ऐसा कहते हुए उसने धरती की तमाम स्त्रियों की ओर देखा। धरती के कोने-कोने को प्रेम के रंग में रंगने का काम स्त्रियों के सिवा कौन कर सकता है भला। इतनी सदियों से इस रंग को सहेजने का बीड़ा तो स्त्रियों ने ही उठाया है। आज दो-दो विश्वयुद्ध का सामना कर चुकी इस दुनिया में अगर अब तक प्रेम पर यकीन कायम है तो स्त्रियों के ही कारण। विध्वंसक समय और समाज में भी लोग उम्मीदों पर भरोसा करना चाहते हैं तो स्त्रियों के ही कारण।

मौसम हों, त्योहार हो या कोई और दिवस सब स्त्रियों ने अपने कंधों पर उठा रखे हैं। लेकिन एक बात बिगड़ गई इस सबमें कि स्त्रियां प्रेम सहेजते-सहेजते, धरती को प्रेम के रंग में रंगने की कोशिश करते-करते खुद को बिसराने लगीं। भूलने लगीं कि जिंदगी का हर रंग कच्चा है, हर राग अधूरा अगर वो खुद की कीमत पर सहेजा गया हो। घर, परिवार, समाज की उम्मीदों का बीड़ा उन्हें थमाकर कहीं उनके रंगों को धुंधला तो नहीं कर दिया गया।

स्त्रियों ने अब अपने लिए रंग तलाशने शुरू किये। पक्के रंग। उन्होंने सूरज से कभी न छूटने वाला सिंदूरी रंग लिया, खेतों से लिया मन को हर्षाने वाला हरा...गेहूं की बालियों सा सुनहरा रंग उन्होंने कानों में पहना और सूरजुखी सा पीला अपने गालों पर रंगा...एक एक कर उसके आंचल में आकर सजने लगे जीवन के सारे रंग...

स्त्रियों की टोली जब टेसू के रंग लिए नदी किनारे पर पहुंचीं तो नदियों ने इठलाकर अपनी हथेली आगे कर दी। टेसू के रंग नदियों में घुलने लगे...रंग धरती पर दौड़ने लगे...स्त्री विमर्श के शोर गुल से अनजान टेसू के रंगों से रंगी हथेलियों वाली स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा...'स्वाभिमान...!'

फागुन ने मुस्कुराकर कहा, चलो देर से सही यह रंग तुम्हें मिल तो गया...स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा, 'हां, हमने यह रंग जिंदगी सहेजते-सहेजते कहीं संभालकर रख दिया था. जैसे घर संभालते-संभालते रख देती हैं तमाम जरूरी चीजें खूब संभालकर। और संभालकर रखी हुई चीजें अक्सर नहीं मिलतीं। फिर अचानक कुछ और ढूढते वक्त कुछ और मिल जाता है जैसे आज फागुन की रंगत ढूँढ़ते ढूंढते, जिंदगी को झाड़ते पोछते वक्त आज यह रंग मिल गया है। अब जो मिल गया है ये रंग तो इस रंग को खोने नहीं देंगे। इस रंग में कितनी प्यारी खुशबू है न?' स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा। बसंत और फागुन दोनों उनके चेहरे पर आई चमक को देख रहे थे। तमाम रंगों में सजी संवरी हंसती खिलखिलाती स्त्रियां यूं तो हमेशा ही लुभाती हैं, उन पर हर रंग निखरता है, वो हर रंग में खिलती हैं लेकिन यह रंग जिसने आज की स्त्रियों का हाथ थामा है उसकी चमक ही अलग है। इक जरा सा खुद का हाथ थामते ही, इक जरा सा खुद को महसूसते ही कैसे सारे रंग जीवन के निखरने लगे...

'तुम्हें यह रंग मिला कहां,' बसंत ने पलकें झपकाकर पूछा, स्त्री ने कहा, 'आज मेरे महबूब शायर साहिर का जन्मदिन है। मैं जब उनकी नज्मों के करीब गई तो वहीं से यह रंग मिला. उनकी नज्में पलटते-पलटते सारे रंग फीके पड़ने लगे कि मोहब्बत के रंग गाढ़े होने लगे, गाढ़े होने लगे अना के रंग, मज़लूमों के, इंसानियत के ह.क में खड़े होने की इच्छा के पक्के रंग, गुरबत से, अन्याय से लड़ने की हिम्मत के रंग. कच्ची उम्मीदों के रंगों से दिल बेजार था बहुत तो किनारा किया झूठे वादों और कच्ची उम्मीदों के रंगों से...अब यूं ही बाजार में बिकने वाले रंगों से न खेलेंगे हम होली न मनायेंगे कोई स्त्री दिवस...कि रंग अपने होने के, खुशबू अपने अस्तित्व की और जेहन में घुलती साहिर की नज्.मों का जादू...'

लड़का अगले रोज फिर आया था उसके पास...इस बार उसकी हथेलियों में लाल, पीले, हरे, नीले रंग नहीं थे...उसके हाथों में थे गालिब, फैज., कैफी, मज़ाज, और साहिर के नगमे...लड़की की आंखों की चमक बढ़ गई थीं...फागुन की महक भी...उसने साहिर की नज्.म को चूमते हुए कहा, जन्मदिन मुबारक मेरे महबूब शायर...!

धरती पर अब नदियां नहीं रंग बह रहे थे, पेड़ों की शाखों पर अब फूलों में राग खिल रहे थे...इस रंग में रंगने से धरती की कोई स्त्री कोई पुरुष बच न जाये ध्यान रखना..

http://epaper.dailynews360.com/1129301/khushboo/08-03-2017#page/1/1

Wednesday, March 1, 2017

पलाश के फूल दिल्ली और मौन में रिल्के...



मौसम वही है जाती हुई सर्दियों का...पलाश आसमान से लेकर ज़मीन तक छाये हुए हैं. इनको देखकर मन चिहुंक उठता है. जाने कैसा रिश्ता है इनसे। जिस तरह ये ऊंची-ऊंची टहनियों पर खिलकर मुस्कुराते हैं उतनी ही शिद्दत से सड़क पे बिछने के बाद मुस्कुराते हैं .. धरती हो या आसमान रंगत एक सी मुस्कुराहट एक सी... बेपरवाह, बेख़ौफ़। मैं इनके इश्क़ में हमेशा सुधबुध खो बैठती हूँ । रास्तों से भटक जाती हूँ, इनके चटख रंग जैसे हाथ पकड़कर किसी और ही दुनिया में ले जाते हैं, वही दुनिया जहाँ शायद मैं हमेशा से जाना चाहती हूँ...

दिल्ली पहुँचते ही पहली मुलाकात पलाशों से ही हुई दूसरी वरयाम सिंह जी से. वरयाम जी अब दूसरे नहीं लगते।उनसे जब भी मिलती हूँ जिस कदर लाड़ से वो मुझे, मेरे सपनों को, मेरी गलतियों को सहेजते हैं उनसे बहुत अपनापा हो गया है. उन्हें देख लगता है कि 'असल में बड़ा होना क्या होता है'.

वो मुझे पलाशों के साथ छोड़कर हँसते हुए चले जाते हैं, ये कहकर 'आना आराम से, मैं हूँ.' वो मुझे समझते हैं. इस दुनिया में कितने कम लोग किसी को समझते हैं.

झरते हुए पलाशों के बीच खड़े होकर लगता है मानो किसी ख्वाब की खिड़की खुल गई हो..मैं उस खिड़की से कूदकर भागी हूँ,  ख्वाबों के जंगलों में. ख्वाब भी तो बड़े आड़े-टेढ़े हैं... फूलों से ढंकी धरती के ख्वाब, नफरतों के साए से भी दूर जिन्दगी की मोहब्बत में डूबे लोगों की दुनिया का ख्वाब.

मेरे आसपास से लोग आ-जा रहे हैं. अजनबी लोग भी जाने-पहचाने लग रहे हैं, जाने-पहचाने भी अजनबी से. बूढ़े बाबा बड़े जतन से चाय बना रहे हैं... अदरक इलायची की खुशबू हवाओं में घुल रही है... मैं पलाश के जंगल में गुम हूँ चाय की खुशबू में कैद...मेरे दोनों हाथ जितने पलाश बटोर सकते थे, बटोर चुके हैं... पलाश बटोरते समय सोचती हूँ, 'काश कुछ और फूल बटोर पाती'. आखिर पलाशों से एकदम पट चुकी धरती पर बैठ गयी हूँ...'खुश हो?' कोरों से बहती बदली पूछती हूँ. चुप रहती हूँ....


बाबा आवाज़ लगाते हैं, 'बिटिया चाय पी लो आकर'
मैं उनको देख मुस्कुराती हूँ. मुझे उनकी आवाज धरती की सबसे प्यारी आवाज़ लगती है मानो वो चाय पीने को नहीं जी लेने को कह रहे हों.  मैं जितने पलाश समेट सकती हूँ सब समेटकर बाबा के पास चाय पीने पहुँचती हूँ. मैं अपनी ख्वाब की दुनिया में  इस जगह का 'पलाश कॉर्नर' रखना चाहती हूँ,  दुनिया के नक़्शे में यह 'मंडी हाउस' है. साहित्य अकादमी का गलियारा गुलज़ार है. कोई कोना मैं भी तलाशती हूँ... जहाँ मैं अपने पलाश भी संभाले रह सकूँ।

रूस का एक संसार खोलती हूँ. बोरिस पास्तेर्नाक डूबकर रिल्के की कवितायेँ पढ़ रहे हैं... मारीना रिल्के को ख़त लिख रही है...रिल्के मौन में हैं... पुश्किन की कविता 'टू द सी' वहीं है आसपास।

पलाश अब भी मुस्कुरा रहे हैं... दिन बीत चुका है, ओहो...'चुका' नहीं है, बीता है. बीतकर चुपचाप बैठा है पास में.
बीते हुए दिन का हाथ पकड़कर मुस्कुराती शाम में प्रवेश करती हूँ. हम दोनों दौड़ते फिरते हैं... झर चुकी शाखों पर नन्ही कोपलों का जादू फैल चुका है... हम उस जादू के साये में भागते फिरते हैं यूँ ही, बेवजह, शाम कब रात हुई, रात कब आधी रात पता नहीं, इतना पता है कि पलाश अब भी हाथ में खिले हुए हैं, उन्हें सिरहाने रखकर नींद की ओर देखती हूँ. बीता हुआ दिन पास आ बैठता है, कहता है, 'बीत जाने के बाद भी इतना बचा हुआ था मैं? मालूम नहीं था...' उसकी आँखों में चमक है, मेरी आँखों में नींद।

(२५ फ़रवरी  २०१७ , दिल्ली )